मैनपुरी। सालों के बाद सभी परिवार के लोग एक साथ घर में रहे तो पुरानी यादों का पिटारा खुल गया। किसी में बचपन में की गई शरारतों को याद किया तो किसी ने बीते जमाने की बातें बताईं। बच्चों के साथ भी लोगों को समय बिताने का समय मिला। इससे लोग खुश नजर आए।
दशकों पुरानी की कहानियां हुईं ताजा
शहर के राजा का बाग निवासी हरप्रसाद यादव के परिवार ने लंबे समय बाद अपनों के साथ समय बिताया। सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य हरप्रसाद यादव बताते हैं कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अपनों के लिए लोगों के पास समय ही नहीं है। अगर छुट्टी भी होती है तो घर के कामकाज निपटाने में समय निकल जाता है। लेकिन पहली बार सभी अपने साथ रहे। बच्चों को पुरानी बातें बताईं तो परिवार के अन्य लोगों ने भी पुराने खट्टे मीठे अनुभव साझा किए।
हालांकि कुछ देर टीवी देश में फैल रहे कोरोना के बारे में जानकारी लेने के लिए सभी ने समाचार भी देखे। लेकिन फिर जब भाभी रामा देवी, बेटे सौरभ और विवेक, बहू अनीता और नातियों के साथ बैठे तो जैसे सभी में एक अलग ही खुशी थी। उन्होंने बताया कि कई दशकों के बाद उन्होंने अपने परिवार के साथ इतना अच्छा समय बिताया। सेवानिवृत्त होने के बाद भी अगर उनके पास समय था तो बेटे अपने काम में व्यस्त रहते थे। बेटों ने भी इस अनुभव को सुखद बाताया। नाती डुग्गू भी बाबा और पापा की कहानियों को सुनकर किसी और ही दुनिया के सपने देखने लगा था। गांव की गलियों से लेकर शहर तक के सफर का उन्होंने पूरा वृत्तांत जो सुनाया था। हरप्रसाद यादव ने कोरोना से बचाव के लिए सभी लोगों से कर्फ्यू का पालन करने की भी अपील की।
बच्चों ने जाना बाबा का बचपन
जनता कर्फ्यू भले ही कोरोना से बचाव के लिए जरूरी था, लेकिन इसने अपनों को एक साथ वक्त बिताने का मौका दिया। ये हम नहीं, बल्कि स्टेशन रोड निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक संतोष कुमार मिश्रा का कहना है। रविवार का दिन उनके लिए बीते कुछ सालों से अपेक्षा काफी अलग था। आज न बच्चों को स्कूल जाना था और न ही बेटों को काम पर। सभी एक साथ थे। घर के छोटे-मोटे काम निपटाने के लिए भी किसी को बाहर नहीं जाना था।
सुबह दैनिक काम से निवृत्त होकर सभी अपने एक जगह जमकर बैठ गए। तभी नाती सार्थक ने पूछ दिया कि बाबा आप छोटे थे तो क्या करते थे। बस फिर बाबा ने यादों का पिटारा खोल दिया। जितनी खुशी संतोष कुमार मिश्रा को बताने में हो रही थी, उससे कहीं अधिक खुश नाती सार्थक उन बातों को जानकर हो रहा था। बेटा डॉ. अंबुज मिश्रा और बेटी भावना भी पास ही बैठी बीच-बीच में उन्हें कुछ पुरानी बातें याद दिला रहे थे। पास ही बैठी दादी प्रेमलता मिश्रा भी उनकी बातों पर मुस्कुरा रही थीं। कई घंटों तक कहानियां का सिलसिला चलता रहा। इसके बाद सभी ने खाना खाया और फिर जुट गए पुरानी यादों को ताजा करने में। प्रेमलता मिश्रा बताती हैं कि न तो परिवार ने कभी इतना समय साथ बिता पाया और न हीं कभी इतनी खुशी हुई।