मैनपुरी। जिले में एक अनोखा गांव है अंजनी, यहां हर घर में गाय-भैंस पाली जाती हैं, लेकिन दूध की बिक्री नहीं की जाती। किंवदंती है कि अगर किसी ने दूध बेचा तो उस पर कोई बड़ी आपदा आ जाएगी। फरमान है कि जिसने भी दूध बेचा, उसका हुक्का पानी बंद कर दिया जाएगा।
शहर मुख्यालय से पांच किमी दूर मैनपुरी-कुरावली रोड स्थित अंजनी गांव में लगभग 8000 की आबादी हैं। गांव में 4000 से अधिक गाय और भैंस पाली जाती हैं। लगभग हर घर में दूध देने वाले पशु हैं और दूध का उत्पादन भी खूब होता है। मगर गांव के लोग आज भी दूध नहीं बेचते।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पूर्वजों ने करीब 300 साल पहले यह शपथ ली थी। गांव में किस्से हैं कि कुछ लोगों ने दूध बेचा तो उनके पशु बीमार हो गए। परिवार पर कोई न कोई आपदा आई। गांव में दूध की बिक्री न होने के कारण आस-पास के गांव या शहर के लोग जरूरत पड़ने पर यहां से छाछ (मट्ठा) ले जाते हैं।
दूध और पूत बिकते नहीं हैं...
गांव के लोगों का कहना है कि वैसे तो उन्हें सटीक तौर पर यह नहीं पता कि उनके किन पूर्वजों ने कब शपथ ली थी। मगर, उन्होंने बचपन से यही सुना है कि दूध और पूत (बेटा) बिकते नहीं हैं। अपने बड़ों से सुनी इस परंपरा पर इसलिए आज भी अडिग हैं। गांव के सेवक राम कहते हैं, हमारा धर्म कहता है कि दूध और पूत बेचे नहीं जाते।
इसी उद्देश्य से हमारे गांव के लोग दूध नहीं बेचते। हम अपनी परंपरा पर अडिग हैं। गांव के सियाराम का मानना है, ग्रामीण अंचल में बच्चों के लिए दूध ही सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए यह अच्छा भी है कि गांव में दूध न बेचा जाए। आज तक हमारे गांव में दूध नहीं बेचा गया।
सोनू यादव बताते हैं, हमारे पूर्वजों का संदेश है कि चाहे कुछ भी कर लेना लेकिन दूध बेचने की कोशिश मत करना। हम अपने पूर्वजों के संदेश को निभाने का काम कर रहे हैं। लालू यादव जैसे युवा भी इस परंपरा के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उनका कहना है, गांव के सभी लोगों ने वर्षों पहले दूध न बेचने की शपथ ली थी। हम युवाओं की भी जिम्मेदारी है कि हम अपने पूर्वजों की उस शपथ को न टूटने दें।
फौजियों के गांव के नाम से है मशहूर
अंजनी गांव की पहचान फौजियों के गांव से भी है। इस गांव में सर्व जाति के लोग रहते हैं। जवानों को फौजी और पुलिस की नौकरी के बाद खेती का यहां मुख्य पेशा है।
13 साल से बंद दुग्ध अवशीतन केंद्र
भोगांव। छाछा गांव में जीटी रोड किनारे बना दुग्ध अवशीतन केंद्र पिछले 13 साल से बंद पड़ा है, जिससे 50 करोड़ रुपये की लागत से बनी मशीनें और उपकरण खराब हो रहे हैं। केंद्र परिसर में झाड़ियां उग आई हैं।
वर्ष 1992 में प्रदेश सरकार के दुग्ध उत्पादन विभाग ने 25 बीघा जमीन खरीदकर 50 करोड़ रुपये की लागत से बनाया था। दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड, छाछा, इसका संचालन करता था। उस समय किसान हजारों लीटर दूध यहां खपाते थे और पराग डेयरी के टैंकर क्षेत्र से दूध लाते थे।
केंद्र में दूध को ठंडा करके पैक किया जाता था और फिर बाजार में बेचा जाता था। जब यह केंद्र चालू था, तो सैकड़ों परिवारों का भरण-पोषण इसी से होता था। केंद्र के सही रखरखाव न होने और दुग्ध उत्पादक संघ की उदासीनता के कारण किसानों ने दूध बाजार में और दूधियों को बेचना शुरू कर दिया। दूध की आवक कम होने से केंद्र घाटे में चला गया और वर्ष 2012 में इसका संचालन बंद हो गया। तब से यह केंद्र बदहाल होता जा रहा है।
विश्व दुग्ध दिवसः दुधारू पशुओं की संख्या 5 लाख, दुग्ध उत्पादन का सर्वे शून्य
मैनपुरी। जिलेभर में दुधारू पशुओं की संख्या करीब 5 लाख है। इन दुधारू पशुओं में गाय और भैंस शामिल हैं। यहां जगह-जगह दूध की खरीद-बिक्री होती है। मगर, किसी के पास खपत और उत्पादन संबंधी कोई डाटा उपलब्ध नहीं है।
दुग्धशाला निरीक्षक अतुल कुमार ने बताया कि दूध की खरीद बिक्री, उत्पादन आदि के बारे में अभी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसकी वजह है कि जिले में अभी सर्वे का काम ही नहीं हुआ है। यदि सर्वे हुआ होता तो उनके पास उपलब्धता आदि का ब्योरा भी होता।
21वीं पशुधन गणना में यह आंकड़ा आया सामने
अप्रैल 2025 में 21वीं पशुधन गणना में ग्रामीण क्षेत्रों में किए गए सर्वे में दुधारू पशुओं की संख्या करीब 5 लाख से अधिक मिली है। इसमें 4.17 लाख से अधिक भैंस और करीब 87,800 गाय शामिल हैं।