नोटबंदी के बाद काम-धंधे बंद हो गए हैं, रोजगार छिन गया है, हमारे पास खाने तक के पैसे नहीं हैं, हम लोन की किश्त कैसे चुकाएं ? यही फरियाद लेकर सैकड़ों महिलाएं बुधवार को कलेक्ट्र्ेट पहुंची। अफसरों से कोई आश्वासन नहीं मिला तो कलेक्ट्रेट के सामने ही एमजी रोड जाम कर दिया। दो घंटे प्रदर्शन कर घर लौट गईं। इनका गुस्सा उन सात फाइनेंस कंपनियों के खिलाफ है, जिनसे इन्होंने लोन ले रखा है।
महिलाओं ने बताया कि नोटबंदी के बाद शहर के तमाम कारखानों में ताले लग गए हैं। इनमें उनके परिवार के सदस्य काम करते थे। किसी को दिहाड़ी तो किसी को साप्ताहिक भुगतान मिलता था लेकिन अब पाई-पाई को मोहताज हैं। फाइनेंस कंपनी के कर्मचारी घर पर आ रहे हैं लोन की किश्त के लिए। न मिलने पर जेल भिजवाने की धमकी दे रहे हैं।
महिलाएं ताजगंज, बिलोचपुरा, नैनाना ब्राहमण, देवरी रोड, रामबाग, टेढ़ी बगिया, बारहखंभा, सेवला से आई थीं। इन्होंने अलग-अलग छह फाइनेंस कंपनियों से लोन ले रखा है। इनमें जनलक्ष्मी, आर्य, उज्जीवन, सेटिन बैंक, एसकेएस बैंक, ग्राम शक्ति, शिखर शामिल हैं।
इन्होंने डीएम आफिस के स्टाफ को लोन के कागजात दिखाए और बताया कि उनसे 24 से 36 फीसदी सालाना ब्याज लिया जा रहा है। पहले कोई दिक्कत नहीं आ रही थी इसे चुकाने में लेकिन अब पाई-पाई के लिए मोहताज हैं तो मजबूरी है। उन्होंने डीएम के नाम ज्ञापन देकर कर्ज माफ कराए जाने की मांग की है।
कारखानों पर ताले, मजदूरी के लाले
आगरा। ताजगंज बिलोचपुरा की बेबी ने बताया कि उसका पति जाकिर बक्से के कारखाने में काम करता है। नोटबंदी के बाद चार दिन कारखाना चला। इसके बाद बंद कर दिया गया। तब से घर में पैसा नहीं आया। किश्त कैसे चुका सकती है?
12 खंभा की मुन्नी देवी ने बताया कि उनके घर पर जूते का काम होता है लेकिन नोटबंदी के बाद किसी फैक्ट्री से काम नहीं मिला है। काम पूरी तरह से बंद हो चुका है। तमाम फैक्ट्रियां भी बंद पड़ी हैं।
बारहखंभा की रमा और देवी ने बताया कि उनके पति मजदूरी करते हैं। रोजाना बिचपुरी रोड पर जाकर खड़े हो जाते थे। यहीं से लोग काम पर ले जाते थे लेकिन आठ दिन से काम नहीं है।
सेवला की राजकुमारी ने बताया कि पति विजय जूता फैक्ट्री में काम करता है। पहले हर शनिवार को मेहनताना मिलता था लेकिन अब तो कारखाना ही नहीं खुल रहा है। पैसा कहां से लाएं?