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शरीर साथ न दे तो पेंशन बनेगी सहारा

Sun, 01 May 2016 02:17 AM IST
अमर उजाला अागरा
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मजदूर - फोटो : demo
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बुजुर्ग हो चुके हैं और मजदूरी के लिए शरीर गवाही नहीं देता। ऐसे बुजुर्ग मजदूरों के लिए विश्व मजदूर दिवस नई सुबह लेकर आएगा। 60 साल या उससे अधिक उम्र के पंजीकृत मजदूरों को हर महीने एक हजार रुपये पेंशन मिलेगी। रविवार को लखनऊ में श्रम एवं सेवायोजन राज्यमंत्री शाहिद मंजूर श्रमिक पेंशन योजना की घोषणा करेंगे। योजना का लाभ उन्हीं मजदूरों को मिलेगा, जो तीन साल पहले पंजीकरण करा चुके होंगे। उप श्रमायुक्त पीके सिंह ने बताया कि 20 मजदूरों को साथ लेकर लखनऊ जाएंगे। इनको योजना का लाभ मिलेगा। पात्रता रखने वाले मजदूरों की सूची बनाकर लाभ दिया जाएगा। 
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84 हजार मजदूर पंजीकृत
श्रम उपायुक्त कार्यालय में 84078 मजदूर पंजीकृत हैं। अधिकांश की उम्र 25 से 40 साल की है। 60 साल से अधिक उम्र के मजदूरों की संख्या करीब 100-150 ही है। वजह, पंजीकरण में दिलचस्पी न दिखाना भी है। 

- दुर्घटना सहायता योजना: निर्माण श्रमिकों की दुर्घटना में मौत पर दो लाख, स्थायी विकलांगता पर डेढ़ लाख और आंशिक विकलांगता पर 80 हजार रुपये मिलते हैं। 17 को मिल चुका है लाभ। 
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- मातृत्व हितलाभ योजना: दो प्रसवों तक 12 हजार। श्रमिकों की पत्नी को छह हजार रुपये। 1186 को मिला लाभ। 
-शिशु हित लाभ: पुत्र जन्म पर दो साल की आयु तक अभिभावक को 10 हजार और बेटी के लिए 12 हजार रुपये। 2052 को मिला लाभ। 
-मृत्यु एवं अंत्येष्टि सहायता योजना: सामान्य मौत पर आश्रित को एक लाख और अंत्येष्टि के लिए 15 हजार रुपये। 105 को मिला लाभ। 
- पुत्री विवाह अनुदान: पुत्री के विवाह के लिए 40 हजार रुपये अनुदान।
- साइकिल सहायता 7463 को मिली।
- 938 को सोलर लालटेन मिली। 

पंजीकरण के लिए यह जरूरी:
निर्माण श्रमिक 18-60 आयु के हों और इससे पहले 12 महीनों में कम से कम 90 दिनों तक कार्य किया हो। माल रोड स्थित कार्यालय से पंजीकरण फार्म प्राप्त करें, दो फोटो, आयु प्रमाण पत्र, निर्माण कार्य में मजदूरी करने का प्रमाण पत्र, 50 रुपये पंजीकरण शुल्क जमा कर श्रमिक पहचान पत्र प्राप्त किया जा सकता है। 

आवास और शौचालय दूर की बात
अनेक योजनाओं के बावजूद मजदूरों का जीवन दोयम दर्जे का है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना है, लेकिन इसमें एक को भी लाभ नहीं मिल सका। आवास के तौर पर झोपड़ी हैं। शौचालय भी नहीं, इसलिए खुले में ही जाने को मजबूर। साफ है कि मजदूर और उनके बच्चों का स्वास्थ्य के प्रति भी सरकारें गंभीर नहीं। 
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