‘दुनिया में बादशाह है सो वह भी आदमी और मुफसिली-ओ-गदा है सो है वह भी आदमी, जरदार बेनवा है सो वह भी आदमी, नेमत जो खा रहा है सो वह भी आदमी, टुकड़े चबा रहा है सो वह भी आदमी।’ इन चंद अल्फाजों में मियां नजीर अकबराबादी ने आदमी की जिंदगी को बयां कर दिया। इन्हीं अहसासों को केंद्रीय हिंदी संस्थान ने ‘आदमीनामा’ फिल्म के जरिये जिंदा करने की कोशिश की है।
नजीर अकबराबादी सच्चे अर्थ में आमजन के शायर थे। उनसे जुड़े मुद्दों को खूबसूरती से उठाया तो उनकी कविताओं में सर्वधर्म सद्भाव की वकालत भी है। उनकी कविता-शायरी में आगरा मचलता है। एक-एक गली, त्योहार, शादी, ब्याह, होली, दीवाली, रोजे, ईद, मोहर्रम, बसंत, पतंग आदि विषय हैं। उनकी इसी छवि को केंद्रीय हिंदी संस्थान ने ‘आदमीनामा’ फिल्म के जरिये देश-विदेश तक पहुंचाने की कोशिश करेगी। फिल्म पिछले तीन साल से बन रही है। इसके फरवरी में रिलीज होने की उम्मीद है। फिल्म को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे इसलिए इसे फेसबुक, यू-ट्यूब, व्हाट्स-एप, ट्विटर आदि पर भी अपलोड किया जाएगा।
आगरा, वृंदावन और दिल्ली में शूटिंग
‘आदमीनामा’ आगरा के ताजगंज, नूरी दरबाजा, मल्को गली आदि में फिल्माई गई है। वृंदावन में भी नजीर के ऊपर कुछ दृश्य लिए गए हैं। वह यहां पर बच्चों को पढ़ाने के लिए जाते थे। दिल्ली में बचपन फिल्माया गया।
छात्र पहुंचाएंगे विदेशों में
‘आदमीनामा’ को विदेशों में भी पहुंचाने के लिए हिंदी संस्थान विदेशों में रह रहे पुराने छात्रों से संपर्क कर रहा है। ये छात्र अपने यहां के पुस्तक विक्रेताओं से संपर्क कर सीडी, डीवीडी की स्टाल लगवाएंगे। संस्थान विदेशी विश्वविद्यालयों से भी संपर्क कर वहां फिल्म दिखाने प्रयास करेगा। इसीलिए फिल्म अंग्रेजी में भी डब की गई है।
फिल्म में इनका भी योगदान
संस्थान के निदेशक प्रो. मोहन, कुलसचिव सीके त्रिपाठी, विभागाध्यक्ष देवेंद्र शुक्ल, प्रो. मोहम्मद नजीर, रियाज खान, डा. जितेंद्र रघुवंशी और डा. ज्योत्सना रघुवंशी आदि ने फिल्म निर्माण में शिेष सहयोग किया है।
वर्जन:
जनकवि नजीर अकबराबादी ने आगरा को अपनी कर्म भूमि बनाकर गौरवान्वित किया। उनकी कविताओं में सर्वधर्म सद्भाव की झलक दिखती है।
डॉ अनुमप श्रीवास्तव, केंद्रीय हिंदी संस्थान
मियां नजीर की कविताएं उन्हें सर्वधर्म का पैरोकार बनाती हैं। उन्होंने सभी मजहबों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की। वह आगरा के ही नहीं, पूरी दुनिया के जनकवि थे।
डॉ जितेंद्र रघुवंशी, रंगकर्मी
अगर चाहे तो इसे लगा सकते हैं
एक नजर नजीर पर
नजीर अकबराबादी का जन्म सन 1735 में दिल्ली में हुआ था। बचपन का नाम शेख मुहम्मद वली और पिता का नाम शेख मोहम्मद फारूख था। उनकी मां आगरा के किलेदार नवाब सुल्तान खां की बेटी थी। फारूख को 12 संतानें हुईं जिनमें से केवल मियां नजीर ही जिंदा बच पाए। सन् 1748, 1756 और 1761 में अहमद शाह अब्दाली के लगातार तीन खौफनाक हमलों में दिल्ली तहस नहस हो गई। आए दिन के खून खराबे से तंग आकर नजीर अपनी नानी के यहां पर मिठाई का पुल नूरी दरवाजा में किराए के घर पर रहने लगे। ताजगंज के मोहम्मद रहमान की पुत्री तहबरुन्निसा बेगम के साथ उनकी शादी हुई। उसके बाद मल्को लगी में ही बस गए। 26 अगस्त सन् 1830 को इस महान शायर का इंतकाल हो गया।