फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

यहां 'राम' के कांवड़ की गंगाजली तैयार करते 'रहीम', पीढ़ियों से हो रहा है ये काम

Sun, 29 Jul 2018 10:24 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला सोरों (कासगंज)
विज्ञापन
कांवड़ के लिए गंगाजली तैयार करते मुस्लिम लोग - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
तीर्थनगरी सोरों का गांव कादरवाड़ी गंगा जमुनी तहजीब का एक उदाहरण है। भले ही अपनी पेट की आग बुझाने के लिए, लेकिन यहां के मुस्लिम परिवार कांवड़ियों के लिए पिछले कई सालों से गंगाजली तैयार कर रहे हैं। 
विज्ञापन


अब यह धंधा उनके लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। लेकिन कई पीढ़ियों से चले आ रहे इस कार्य को वो बंद नहीं करना चाहते। उनके द्वारा तैयार की जाने वाली गंगाजली को बड़े व्यापारी खरीदकर कांवड़ियों को बेचते हैं।

गांव में इन दिनों तीन भट्टियों पर ही गंगा जली बनाने का काम चल रहा है। कारीगर कांच को आग में तपाकर सांचों की सहायता से गंगाजली का आकार देते हैं। 
विज्ञापन

सीजनल होता है ये काम

प्रतिदिन 16 घंटे तक काम करने वाले कारीगरों को इतना मुनाफा नहीं होता कि वो अपने परिवार का अच्छे से भरण पोषण भी कर सकें। यह काम सीजनल होता है। जो कांवड़ मेले के दिनों ही होता है। 

गंगाजली के लिए कांच फिरोजाबाद से मंगाया जाता है। ईधन के लिए कोयले व लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। धधकती आग के बीच काम करने वाले कारीगरों को सांस की बीमारी व अन्य त्वचा संबंधी रोग घेरे रहते हैं। 

इस गंगाजली निर्माण के काम में परिवार के सभी महिला पुरुष सदस्य लगते हैं। दिन में 300 गंगाजली ही तैयार हो पाती हैँ। जिनको बेचकर महज ढाई सौ रूपये प्रतिदिन का मुनाफा होता है। 
विज्ञापन

ये कहना है कारीगरों का

गंगाजली को सोरों के अलावा कछला, राजघाट से भी आकर व्यापारी खरीद ले जाते हैं। साल के बाकी बचे  महीनों में यह कारीगर दूसरे के खेतों में मजदूरी या बाहर जाकर अन्य कार्य कर अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं। 
        
गंगाजली बनाने वाले 50 वर्षीय कारीगर हनीफ का कहना है कि उसके परिवार में गंगाजली बनाने का काम तीन पीढ़ियों से हो रहा है। उसके पास दो बीघा जमीन है पानी का इंतजाम न होने के कारण जमीन बेकार पड़ी है। मेले के बाद मजदूरी कर गुजारा करना होता है।      
     
कारीगर जाबुद्दीन 32 वर्ष का कहना है कि उसके पास कोई जमीन नहीं है। पांच पीढ़ियों से उसके परिवार में यह काम हो रहा है। कांवड़ मेले के बाद वह जीवन यापन के लिए दिल्ली रिक्शा चलाने चला जाता है।    
         
नूर मोहम्मद 30 वर्ष का कहना है कि इस काम से गुजर बसर मुश्किल से होती है। कस्बों में जा जाकर मजदूरी करके ही दो जून की रोटी का जुगाड़ हो पाता है। पीढ़ियों से पुराना काम है इसलिए बद नहीं करते। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें