मैनपुरी। दीपों का त्योहार दिवाली करीब आते ही कुंभकारों के चाक घूमने लगे हैं। वह दिन-रात मिट्टी के दीये बनाने में जुटे हुए हैं। साथ ही पीओपी (प्लास्टिक ऑफ पेरिस) और मिट्टी से तैयार गणेश और लक्ष्मी की मूर्तियों को भी अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस बार कुंभकार परिवारों को अच्छी बिक्री की उम्मीद है।
बीते कुछ सालों में चीन निर्मित दीये और कैंडल ने कुंभकारों के काम पर ब्रेक लगा दिया था, लेकिन चीनी सामान के प्रति शुरू हुए विरोध से एक बार फिर मिट्टी के दीयों को दिवाली पर बढ़ावा मिला। इतना ही नहीं, इससे कुंभकार परिवारों का रोजगार भी चल निकला। शहर के आगरा रोड स्थित प्रजापति कॉलोनी के हर घर में इन दिनों चाक तेजी के साथ घूम रहा है। वह मिट्टी के दीये तैयार कर रहे हैं। इस बार उन्हें अच्छी बिक्री की उम्मीद है। एक कुंभकार द्वारा प्रतिदिन औसतन एक हजार दीये बनाए जा रहे हैं। बाजार में 40 रुपये प्रति सौ दीये की कीमत पर इनकी बिक्री की उम्मीद है।
मूर्तियों को भी दे रहे अंतिम रूप
मिट्टी के दीयों के साथ ही कुशल कुंभकार माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की मूर्तियां भी बना रहे हैं। बड़ी संख्या में मूर्तियां बनकर तैयार हैं। अब इन्हें रंग रोगन कर अंतिम रूप दिया जा रहा है। मूर्ति कला केंद्र के संचालक सतेंद्र कुमार ने बताया कि उनके पास 40 रुपये जोड़ी से लेकर एक हजार रुपये प्रति जोड़ी तक की मूर्तियां उपलब्ध हैं।
पहले से ही कराई है बुकिंग
आधुनिकता के चलते बड़ी संख्या में जिले के कुंभकार परिवार दीये बनाने के काम को अलविदा कह चुके हैं। ऐसे में बिक्री के लिए दुकानदार व दूसरे कुंभकार बने हुए मिट्टी के दीये ही खरीदते हैं। इसके लिए उन्होंने कुंभकारों के पास पहले से बुकिंग कराई है। एक-एक कुंभकार के पास औसतन 15 हजार से अधिक दीयों की खरीद के लिए बुकिंग कराई गई है।
एक बार तो मिट्टी के दीयों का काम बिल्कुल खत्म हो गया था, लेकिन बीते तीन सालों में सुधार हुआ तो हमें भी रोजगार वापस मिल गया। इस बार अच्छी बिक्री की उम्मीद है।
दीपक प्रजापति।
बीते वर्ष दिवाली पर सारे दीये बिक गए थे। इसके चलते इस बार पहले की अपेक्षा अधिक दीये बनाए हैं। इस बार भी दिवाली तक सारे दीये बिक जाने चाहिए।
सुघर सिंह।
हम तो हमेशा से ही मिट्टी के दीये बनाते आए हैं। हमने उस समय में भी हार नहीं मानी जब लोग पूरी तरे मोमबत्ती पर निर्भर हो गए थे, लेकिन अब फिर लोग वापस लौट रहे हैं।
रामसिंह प्रजापति।
दिवाली के त्योहार पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। आधुनिकता में लोग इसे भूल गए। अब युवा पीढ़ी इन परंपराओं की ओर लौट रही है।
अमित प्रजापति।