मोबाइल स्क्रीन का नशा, अफीम और कोकीन से भी ज्यादा घातक है। डिजिटल नशे का शिकार लोग दिन भर मोबाइल स्क्रॉल करते रहते हैं। इसी का फायदा उठा साइबर ठग उन्हें अपना शिकार बना लेते हैं। ठगी होने पर गोल्डन आवर (घटना से एक घंटे तक का समय) में 1930 पर शिकायत करने से रकम वापसी की उम्मीद भी बढ़ जाती है। साइबर अपराध के कारण, बचाव और कानून की जानकारी डीजीपी राजीव कृष्ण ने दी। वो सूरसदन में आयोजित साइबर जागरूकता कार्यशाला को वर्चुअल माध्यम से संबोधित कर रहे थे।
कहा कि बच्चे और युवा मनोरंजन के पबजी, लूडो जैसे ऑनलाइन खेलों में घंटों स्क्रीन पर बिताते हैं। इस दौरान वास्तविक दुनिया से इनका संपर्क कट जाता है। बच्चों को नहीं पता होता कि उनके साथ गेम खेलने वाला व्यक्ति वास्तविकता में कैसा है। इनके माध्यम से ही साइबर अपराधी पहले दोस्ती फिर पर्सनल नंबर साझा करते हैं और अंत में अपना शिकार बना लेते हैं।
कई बार ऐसे मामले सामने आए है कि उम्र बदलकर कुछ लोग ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़ जाते है। अपनी बातों में फंसाकर युवाओं से उनके पर्सनल फोटो व अन्य जानकारी प्राप्त लेते हैं। इसके बाद ब्लैक मेलिंग शुरू कर देते है। बच्चे परिजन से छुपाकर उनकी डिमांड पूरी करने के लिए घर से चोरी करते है। साइबर ठगी, ब्लैक मेलिंग आदि के शिकार व्यक्ति को सबसे पहले परिवार के सदस्यों को बताना चाहिए। इसके बाद साइबर सेल को सूचना देनी चाहिए।
तीन सत्रों में आयोजित कार्यशाला के दूसरे सत्र में शहर के उद्यमी, समाजसेवी व सीनियर सिटीजन को जागरूक किया गया। साइबर एक्सपर्ट ने अपराध के तरीके और उन्हें रोकने के उपाय बताए गए। कार्यक्रम में पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार, जिलाधिकारी अरविंद मल्लप्पा बंगारी, एडिशनल कमिश्नर रामबदन सिंह, डीसीपी सैय्यद अली अब्बास, अभिषेक अग्रवाल आदि पुलिस अधिकारी मौजूद रहे।
एपीके फाइल को ओपन करने से बचे
साइबर ठग अनजाने नंबर से शादी के कार्ड, आरटीओ चालान आदि की फर्जी फाइल को विभिन्न माध्यम से एपीके फाइल के रूप में भेजते हैं। यह एक क्लिक पर वह डाउनलोड हो जाती है। इससे मोबाइल हैक हो जाता है। इनके माध्यम से साइबर अपराधी आपका पूरा डेटा चुरा लेते हैं और आपको पता भी नहीं चलता। इसके बाद ठगी और ब्लैकमेलिंग को अंजाम दिया जाता है।
सेवानिवृत कर्मचारी हैं निशाने पर
आज कल सेवानिवृत लोगों को साइबर ठग सबसे ज्यादा शिकार बना रहे हैं। वह उन्हें वाॅट्स एप कॉल कर सीबीआई, एटीएस व सुरक्षा एजेंसी का छापा मारने का डर दिखाकर डिजिटल अरेस्ट करते हैं। फिर बचाने के नाम पर जमा पूंजी को अपने खातों में ट्रांसफर करा लेते हैं। सीनियर सिटीजन डरें नहीं। डिजिटल अरेस्ट जैसा कुछ नहीं होता। वह बिना डरे पुलिस को सूचना दें।