दैवीय सम्पद मंडल के परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर शारदानंद सरस्वती ब्रह्मलीन हो गए। रविवार की रात उन्होंने गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। वह लंबे से अस्वस्थ चल रहे थे। 80 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। रात में ही उनका पार्थिव शरीर श्रीएकरसानंद आश्रम लाया गया। सोमवार को हजारों श्रद्धालुओं ने आश्रम पहुंचकर उनके अंतिम दर्शन किए। दोपहर बाद उनकी अंतिम यात्रा शहर में निकाली गई। शाम चार बजे श्रीएकरसानन्द आश्रम परिसर में उनको समाधिस्थ किया गया।
महामंडलेश्वर शारदानंद सरस्वती की अंतिम यात्रा दोपहर बाद एकरसानंद आश्रम से शुरू हुई। एकरसानंद आश्रम से शुरू हुई अंतिम यात्रा पंजाबी कॉलोनी, स्टेशन रोड, भांवत चौराहा, करहल बाईपास चौराहा, करहल रोड, सदर बाजार, क्रिश्चियन तिराहा होती हुई एकरसानंद आश्रम पहुंची। जहां महामंडलेश्वर शारदानंद सरस्वती को समाधिस्थ किया गया। अंतिम यात्रा में सुमित चौहान, पुरुषोत्तम गुप्ता, पीयूष चंदेल, अजयपाल सिंह, अमित गुप्ता, सुभाष मिश्रा, कमल शर्मा, संदीप चतुर्वेदी, वीरसिंह भदौरिया, अशोक गुप्ता पप्पू, रमेशचंद्र वर्मा सर्राफ, ग्याप्रसाद दुबे, जगदीश वशिष्ठ, साधना तिवारी, अमृता चौहान मौजूद रहे।
शारदानंद सरस्वती बाल्यकाल में स्वामी भजनानंद के पास आए थे। वह अपना नाम और पता भी नहीं बता सके। भजनानंद ने उन्हें आश्रम में रख लिया। आश्रम में ही शिक्षा दीक्षा दिलाई। महामंडलेश्वर स्वामी हरिहारानंद महाराज ने बताया कि बड़ा होने पर स्वामी भजनानंद ने उन्हें वेदों के अध्ययन के लिए काशी भेज दिया। काशी से वापस आने पर स्वामी भजनानंद ने बालक के विरक्त स्वभाव को देखकर वर्ष 1976 में ऋषिकेश में गंगा तट पर संन्यास की दीक्षा दे दी। वेदांत की शिक्षा के बाद वह सन्यास ग्रहण करते ही महामंडलेश्वर शारदानंद सरस्वती हो गए।