यूं तो पूरा ब्रज धार्मिक महत्व को समेटे हुए है लेकिन साहित्य-संगीत और ब्रज संस्कृति का अनूठा संगम है पारसौली का चन्द्र सरोवर। यह वही स्थान है जहां शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में भगवान श्रीकृष्ण ने सोलह हजार एक सौ आठ गोपियों के साथ महारास किया था।
पौराणिक मान्यता में आज भी महारास चबूतरा है जिसका पुनरोद्धार किया गया है। पाराशर ऋषि का तपस्या स्थल होने के कारण इसे पारासौली नाम दिया गया। शरद पूर्णिमा पर आज एक बार फिर 21 हजार दीपों की रोशनियां इस सरोवर की छटा को अद्भुत रूप देती नजर आएंगी।
चन्द्र सरोवर तट स्थित बल्लभाचार्य जी की बैठक पर भारी संख्या में पुष्टी मार्गीय भक्त अपने आराध्य ठाकुर जी को लेकर पहुंच गए हैं। जहां महाप्रभु जी की बैठक के समीप खीर का भोग लगाया गया। महारास चबूतरे पर शाम 6 बजे पद गायन एवं गोपी गीत कन्हैया बाबा के सानिध्य में शुरू हुआ।