ब्रज क्षेत्र में बहुजन समाज पार्टी नए पैंतरें से सियासत साध रही है। हालांकि अब तक के दांव 'हाथी' की सुस्त चाल को रफ्तार नहीं दे सके हैं। यदि इस बार भी ऐसा हुआ तो देखना होगा कि इसका लाभ भाजपा के मिलेगा या फिर सपा बाजी मारेगी?
देश में इन दिनों लोकसभा चुनाव का खुमार सिर चढ़कर बोल रहा है। प्रत्याशियों में जीत की ललक उनकी तैयारियों से साफ दिखाई दे रही है। नेता जनसंपर्क कर जनता से अपनी पार्टी के लिए समर्थन मांग रहे हैं। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र की लोकसभा सीटों पर लंबे समय से बहुजन समाज पार्टी हर बार नए चेहरे पर दांव लगाती रही है। तब भी किसी भी सीट पर पार्टी को सफलता नहीं मिली है। बात सिर्फ नए चेहरों तक ही सीमित नहीं है, राजनीति के दिग्गज खिलाड़ियों पर भी बसपा ने दांव लगाया वह भी चुनावी बेड़ा पार नहीं करा पाए।
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इस बार बसपा किसी भी दल से गठबंधन किए बगैर अकेले दम पर चुनाव मैदान में है। बसपा ने ब्रज क्षेत्र की सभी लोकसभा सीटों पर नए चेहरे उतारे हैं। चुनावी जमीन पर बसपा का यह प्रयोग कितना सफल होगा इस पर सभी की नजर है। वैसे अब तक के चुनाव के नतीजे बताते हैं कि बसपा को कभी दूसरे तो कहीं तीसरे नंबर पर ही संतोष करना पड़ा है। बसपा की सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला हर बार ब्रज क्षेत्र में फेल रहा है।
2019 के चुनाव में बसपा का सपा के साथ गठबंधन था। बसपा पूरी ताकत के साथ आगरा सीट पर चुनाव लड़ी थी। हाथरस के मनोज सोनी को टिकट दिया लेकिन बसपा यह चुनाव भी नहीं जीत पायी। पार्टी का प्रत्याशी दूसरे स्थान पर ही रहा। इस बार पार्टी ने नए चेहरे के रूप में पूजा अमरोही को चुनाव मैदान में उतारा है। फिरोजाबाद में पूरी ताकत लगाने के बाद भी बसपा अभी तक खाता नहीं खोल पाई है।
2009 के आम चुनाव में बसपा ने अखिलेश यादव के खिलाफ ब्रज के दिग्गज नेता प्रोफेसर एसपी सिंह बघेल को उतारा था लेकिन बसपा यहां दूसरे स्थान पर रही। 2009 के उप चुनाव में भी बसपा को यहां जीत नहीं मिल पाई। 2014 में चुनाव में बसपा ने क्षत्रिय कार्ड खेला और विश्वदीप सिंह को टिकट दिया लेकिन बसपा तीसरे स्थान पर रही। 2019 में बसपा का सपा के साथ गठबंधन था। तब भी सपा को जीत नहीं मिल पायी।
एटा-मैनपुरी में भी दांव फेल
एटा में 2014 बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी पर दांव लगाया। पार्टी के उम्मीदवार नूर मोहम्मद खां तीसरे नंबर पर रहे। 2019 में गठबंधन के तहत सपा प्रत्याशी भी एटा से जीत नहीं सका। 2014 में मैनपुरी से बसपा की डॉ. संघमित्रा मौर्य तीसरे नंबर पर रहीं थीं। 2009 विनय शाक्य दूसरे नंबर पर और 2004 अशोक शाक्य भी दूसरे नंबर पर रहे थे। यानी सपा के गढ़ में बसपा ही सपा को टक्कर जरूर देती दिखाई दी लेकिन जीत नहीं सकी। अब मैनपुरी से बसपा ने फिर नए चेहरे पर दांव लगाया है। शाक्य समाज से डॉ. गुलशनदेव शाक्य को टिकट दिया है।
मथुरा में दिग्गज भी नहीं दिला सके जीत
मथुरा में 2014 में बसपा के विवेक निगम तीसरे नंबर पर रहे। 2009 में बसपा ने ब्राह्रमण कार्ड खेला और पूर्व मंत्री और ब्रज की पट्टी के दिग्गज नेता श्याम सुंदर शर्मा पर दांव लगाया। तब भी बसपा जीत नहीं पायी, दूसरे नंबर पर ही संतोष करना पड़ा। 2004 में बसपा के चौधरी लक्ष्मी नरायन दूसरे नंबर पर रहे। इस बार बसपा ने यहां से नए फिर चेहरे पर दांव लगाया है। कमलकांत उपमन्यु का टिकट काटकर बसपा ने पूर्व आईआरएस अधिकारी सुरेश सिंह को मैदान में उतारा है।
ये युवा चेहरे, राजनीति में नए
फिरोजाबाद में बसपा ने युवा चेहरे पर दांव लगाकर एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। यहां सत्येंद्र जैन सौली को टिकट दिया है। सौली वैश्य समाज से जुड़े हैं और युवा भी हैं। उनकी पहले से कोई राजनीतिक प्रष्ठभूमि नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता के रूप वह सक्रिय रहे हैं।
बसपा ने सपा के गढ़ में राजनीति के नए खिलाड़ी पर दांव लगाकर वैश्य कार्ड भी खेला है। ऐसा ही प्रयोग बसपा ने मैनपुरी में किया है। डॉ. गुलशनदेव शाक्य की भी पहले से कोई राजनीतिक प्रष्ठभूमि नहीं है। वह भी युवा हैं। शाक्य वोटों को बांधे रखने की कोशिश के साथ नए चेहरे पर बसपा का प्रयोग कितना सफल होगा इस पर सभी की नजर है।