गांव में नाली-खडंजा की मांग पर तहसील दिवस में भी सुनवाई न हुई तो मनकेड़ा पंचायत के गांव नगला कारे की सावित्री देवी वीरू की तर्ज पर बंसती बन गई। मंगलवार दोपहर वह पुलिस लाइन में बनी 20 मीटर ऊंची पानी की टंकी पर चढ़ गई। एलान किया कि अब भी सुनवाई नहीं हुई तो वह वहीं से कूदकर जान दे देगी। फिर तो हड़कंप मच गया। टंकी के नीचे पहले भीड़ जुटी फिर अफसरों का अमला। दो घंटे मान-मनौवव्ल के बाद अफसर उसे नीचे उतरने को राजी करने में सफल हो पाए।
नगला कारे निवासी जय सिंह की पत्नी सावित्री (35) मंगलवार को तहसील दिवस में गांव की 25-30 महिलाओं के साथ तहसील सदर आईं। वे गांव में नाली-खड़ंजा बनवाने की मांग कर रही थीं। उनके मुताबिक एसडीएम सदर ने भी उनके प्रार्थनापत्र पर कोई कार्रवाई नहीं की। इससे पहले ब्लाक, बीडीओ, सीडीओ और डीएम दफ्तर के चक्कर लगाकर थक चुकी सावित्री वहां से पुलिस लाइन पहुंची। दोपहर 1:15 बजे वह टंकी पर चढ़ने लगी तो साथ की महिलाओं ने रोका तो उसने कहा, ‘रोड (खड़ंजा) नहीं बनी तो जान दे दूंगी।’ और टंकी पर एकदम ऊपर जा चढ़ी। वहां से खुदकुशी का एलान दोहराया तो सनसनी फैल गई।
यह सनसनी तब और बढ़ गई जब सूचना पर आई फायर बिग्रेड की टीम ने उसे उतारने की कोशिश की। वह टंकी से लटक गई और चेतावनी दी कि जबरदस्ती हुई तो कूद पड़ेगी। बहन मिथलेश और पति जय सिंह भी सावित्री मनाने आए, पर उसने एक न सुनी। दोपहर सवा दो बजे एडीएम (वित्त एवं राजस्व) राजकुमार, एसपी सिटी समीर सौरभ, एएसपी शैलेश पांडेय आए। माइक मंगाया गया। अधिकारियों ने सावित्री से बात की। उसने बताया कि वह तीन महीने में हर अधिकारी और सांसद चौधरी बाबूलाल के यहां तक दस्तक दे चुकी है। गांव के रास्तों में एक-एक फीट कीचड़ भरा है। बच्चे-महिलाएं घायल हो रहे हैं। एडीएम ने निर्माण की पूर्व तैयारी के लिए ग्रामीण अभियंत्रण के अभियंता को उसके गांव भेजा। तब कहीं दोपहर 2:45 बजे सावित्री नीचे उतरी।
‘बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे साहब!’
अधिकारियों से बातचीत में सावित्री का भावुक भी हुई। उसने बताया कि जलनिकासी नहीं होने से गांव में रास्तों में कीचड़ भरा रहता है। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। उन्हें पहुंचाना पड़ता है। उसने कहा,‘मेरे भी बच्चे हैं, अगर जेल भेजना चाहें तो मैं तैयार हूं। मुझे किसी ने नहीं उकसाया। मुझे चुनाव नहीं लड़ना है। नेता तो झूठे और भ्रष्ट हैं। अगर खड़ंजा बना तो पूरे गांव का भला होगा।’
‘ऐसी-वैसी मत समझना, फिर आ जाऊंगी’
भले पढ़ी-लिखी नहीं है लेकिन सावित्री के सवालों पर अधिकारी निरुत्तर रहे। उसने उन्हें खूब खरीखोटी भी सुनाई। कहा कि अगर तहसील दिवस में ही सुनवाई कर लेते तो मरने क्यों आती। उसने चेताया भी, ‘ऐसी-वैसी मत समझना। अगर रोड न बनी तो फिर आ जाऊंगी जान देने।’ उसके तेवर तीखे और मांग जायज थी, शायद यही देखकर अफसरों ने उसे बिना कार्रवाई जाने दिया।
गांव में सड़क की समस्या है। मेरे संज्ञान में मामला पहली बार आया। वे मेरे कार्यालय के बाहर के धरना देने लगीं तभी समझाया था। सड़क निर्माण आगणन तैयार करने लिए बीडीओ को निर्देश भी दिए। कल तक आगणन तैयार हो जाएगा।
पी दिनेश कुमार, एसडीएम सदर