उत्तर प्रदेश शासन ने कासगंज के एसपी सुनील कुमार को हटा दिया है। उनकी जगह पियूष श्रीवास्तव को भेजा गया है। सुनील कुमार का हटना 27 जनवरी से ही तय माना जा रहा था। कारण था कि वह लगातार बिगड़े हालात को संभाल नहीं पा रहे थे।
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प्रशासन की रिपोर्ट भी उनके खिलाफ गई। इसमें बताया गया कि 26 को हुए बवाल के दौरान कहीं पर पुलिस मौजूद नहीं थी तो कहीं पर बलवाइयों को रोक नहीं पा रही थी। हिंसा में मारे गए चंदन के हत्यारोंपियों की गिरफ्तारी में बरती गई ढिलाई भी सुनील कुमार को भारी पड़ी।
दो दिन पहले ही डीजीपी ओपी सिंह ने उनके खिलाफ शासन को रिपोर्ट दे दी थी। तभी से माना जा रहा था कि उन्हें हटाए जाने का आदेश कभी भी आ सकता है। उन्हें तब हटाया गया, जब हालात कुछ सुधर चुके थे।
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माना जा रहा है कि इसकी वजह बवाल से निपटने के लिए अपनाई गई योजना का कमजोर होना रहा। पुलिस सूत्रों की मानें तो अभी कुछ और अफसरों पर गाज गिर सकती है। 1.5 लाख आबादी वाले एटा शहर में एक ही कोतवाली है। यहां की पुलिस ने भी मुस्तैदी नहीं दिखाई।
5 दिन पहले ही बन गए थे तनाव के हालात
मौके पर पुलिस
- फोटो : अमर उजाला
चामुंडा मंदिर मार्ग पर लोगों ने डीएम और एसपी से मांग की थी कि यहां से श्रद्धालु आते हैं, भारी वाहनों का आवागमन बंद कराया जाए। डीएम और एसपी ने पुलिस से बैरियर इस तरह लगाने के लिए कहा कि छोटे वाहन निकल पाएं लेकिन बड़े नहीं।
पुलिस ने गलती यह कर दी कि पूरे रास्ते पर बैरियर लगा गिया। इससे आवागमन पूरी तरह बंद हो गया। दूसरे समुदाय के लोगों ने इसका विरोध किया। इस कारण सांप्रदायिक तनाव बन गया। इस पर पुलिस ने आधा रास्ता खोल तो दिया लेकिन तनाव बना रहा। पुलिस ने लोगों को यह भी नहीं बताया कि यह सब उसकी नासमझी से हुआ है।
दो साल से जमे थे सुनील कुमार
सुनील कुमार सिंह
- फोटो : अमर उजाला
सुनील कुमार को योगी सरकार में भी काफी पसंद किया जा रहा था। आगरा जोन के आठ जनपदों में वह अकेले एसपी रहे जो सरकार केबदलने पर भी हटाए नहीं गए। वह कासगंज में लगभग दो साल एसपी रहे।
इस दौरान तमाम छोटे - बड़े मसले आए लेकिन वह बने रहे। पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के दौरान उन पर काफी भरोसा किया गया। योगी सरकार आने के बाद सात जिलों के एसपी /एसएसपी बदल दिए गए लेकिन वह बने रहे।
- माहौल में तनाव होने के बावजूद संवेदनशील इलाकों में पुलिस फोर्स तैनात नहीं की गई। तिरंगा यात्रा के दौरान बड्डू नगर में एक सिपाही तक नहीं था।
- बड्डू नगर में बवाल के बाद भी अफसर पुलिस लाइन के कार्यक्रम में व्यवस्त रहे। कासगंज शहर में उपद्रव हो रहा था लेकिन पुलिस तैनात नहीं की गई थी।
- कोतवाली के पास फायरिंग हो रही थी, फिर भी थाने से कोई बाहर नहीं निकला। यहीं पर चंदन को गोली मारी गई। वह कोतवाली के पिछले गेट के नजदीक तक घायल आया लेकिन पुलिस वाले बाहर नहीं निकले।
- चंदन की हत्या के बाद आरोपी शहर में ही मौजूद रहे। उनकी गिरफ्तारी के लिए प्रयास नहीं किया गया। जब भाजपा नेताओं ने इसका सवाल उठाया, तो दो दिन बाद 28 की सुबह उनके घरों में दबिश दी गई।
- फोर्स तो खूब बुला ली गई लेकिन इसकी तैनाती ठीक से नहीं की गई। दो कंपनी आरएएफ, छह कंपनी पीएसी और आठ जिलों की फोर्स के बावजूद आगजनी की घटनाएं 28 तक होती रहीं।