शहीद की प्रतिमा की आरती उतारते परिजन।
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आगरा जिले में बाह तहसील का कोरथ गांव वीर सपूतों की जन्मभूमि है। यहां के कई परिवार सेना से जुड़े हैं। लड़ाई चाहे चीन से हो या फिर पाकिस्तान से। यहां के वीर सपूतों ने दुश्मनों के दांत खट्टे किए हैं। इनमें नायब सूबेदार लायक सिंह की वीरगाथा सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है। वर्ष 1999 में कारगिल जंग में दुश्मन के छक्के छुड़ाकर अपनी जान कुर्बान कर दी थी। उनकी याद में गांव में शहीद स्मारक बनवाया गया है, जहां शहीद की प्रतिमा स्थापित है। परिवार वाले उनकी भगवान की तरह पूजा करते हैं।
पहले मां रामश्री लड्डू गोपाल की तरह उनको पूजती थी, उनके निधन के बाद छोटे भाई सतेंद्र सिंह की पत्नी रजनी देवी हर रोज पूजा करती हैं। पुष्प चढ़ाती हैं, अगरबत्ती जलाती हैं। बच्चे भी उनका हाथ बटाते हैं। उन्होंने बताया कि तीज त्योहार पर शहीद को भगवान की तरह भोग लगाया जाता है। उसके बाद ही परिवार भोजन ग्रहण करता है। कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर शनिवार को रजनी देवी शहीद की प्रतिमा की आरती उतारती हुई मिली। उन्होंने बताया कि शहीद के बलिदान पर गर्व है, लेकिन स्मारक की उपेक्षा से परिवार आहत है। स्मारक पर सोलर लाइट लगी थी, जिसे 5 साल पहले खराब होने पर उखाड़ लिया था। तब से अब तक स्मारक अंधेरे में है। पूजा करने के लिए आते-जाते सांप के डसने का डर रहता है। पंचायत के प्रतिनिधि सोलर लाइट लगवाने का आश्वासन देते रहे हैं, लेकिन अब तक उपेक्षा जारी है।
शहादत को 27 साल बीते, शहीद के परिवार को पट्टे की जमीन पर नहीं मिला कब्जा
कारगिल की जंग में बहादुरी लड़कर शहीद हुए बाह के कोरथ गांव के नायब सूबेदार लायक सिंह के परिवार को पट्टे में मिली जमीन पर 27 साल बाद भी कब्जा नहीं मिल सका है। शहीद के भाई सतेंद्र सिंह ने बताया कि परिवार को 10 बीघा जमीन का पट्टा मिला था। 2 बीघा जमीन पर ही कब्जा मिल सका है। पट्टे की जमीन पर कब्जे के लिए विभिन्न स्तरों पर ढेरों शिकायतें की। कब्जा नहीं मिला तो शिकायतें करना भी छोड़ दिया है। सरकार की यह घोषणा अधूरी रह गई।
शहीद की वीरनारी शकुंतला देवी ने 2001 में गौरव का मंदिर बनवाया। लायक सिंह के नाम पर गांव के लिए शहीद मार्ग तो बन गया लेकिन सड़क उखड़ी पड़ी है। भाई ने बताया कि उनके घर के ऊपर से बिजली की लाइन खींच दी है। एचटी लाइन का बनाया जाल दीवार को छूता है। करंट लगने के खतरे के बारे में कई बार अधिकारियों से गुहार लगाई। कोई सुनवाई नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि पहले शहादत दिवस पर एसडीएम श्रद्धांजलि को आए थे। उपेक्षा का आलम ये है कि शहादत दिवस पर भी परिवार के आंसू पौंछने कोई उनके घर पर नहीं पहुंचता। सैनिक बोर्ड की ओर से भी उनकी समस्या जानने का कभी प्रयास नहीं किया गया।
बाह के 400 रणबांकुरों ने पाकिस्तानी सेना को चटाई थी धूल
कारगिल युद्ध में बाह के करीब 400 रणबांकुरों ने अपनी बहादुरी से पाकिस्तान को धूल चटाई थी। इस युद्ध में कोरथ गांव के नायब सूबेदार लायक सिंह, खंडेर के जितेंद्र सिंह चौहान, मलुपुर के धर्मवीर सिंह, बसेरे काजी के कुंवर सिंह समेत सात सपूतों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। रुदमुली के 6, कोरथ के 7 जवानों के अलावा उमरैठा, बासौनी, नावली, क्वारी, चांगौली, फतेहपुरा, सिमराई, जोमर्द पुरा आदि गांवों के 400 सपूतों ने कारगिल जंग में अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया था। कारगिल विजय दिवस याद आते ही बाह के यमुना-चंबल पट्टी के हर युवा का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
जम्मू कश्मीर में तीन आतंकियों को ढेर कर वीरता पुरस्कार जीतने वाले रिटायर्ड सैनिक जयवीर सिंह इन युवाओं को सेना में भर्ती होने का हौसला दे रहे हैं। उन्हें सेना भर्ती के मानक बताकर कड़ा अभ्यास करने के लिए प्रेरित करते हैं। गांव कोरथ के कैप्टन रमाशंकर सिंह, क्वारी के जितेंद्र सिंह भदौरिया, सिमराई के जयवीर सिंह ने कारगिल जंग के विजय दिवस की पूर्व बेला पर गौरव गाथा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कारगिल जंग की वीरगाथाएं यहां के युवाओं में देश भक्ति का जोश भर देती है। उनके सपने को पूरा करने के लिए सरकार को बाह में सैनिक ट्रेनिंग सेंटर खोलना चाहिए। शिवा, सचिन, ऊदल सिंह ने कहा कि कारगिल शहीद जितेंद्र सिंह, लायक सिंह की बहादुरी के किस्से सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करते हैं। सोनू कहते हैं कि कारगिल के हीरो से लेकर 1965, 1971 के सैनिकों के बलिदान के किस्से गांव में युवाओं के लिए प्रेरणा का काम कर रहे हैं।
हवलदार नीवेंद्र सिंह की वीरगाथा ऐसी कि दुम दबा कर भागे थे पाकिस्तानी सैनिक
रुदमुली के हवलदार नीवेंद्र सिंह भदौरिया दुनिया में नहीं रहे, उनकी स्मृति शेष है। कारगिल के ग्लेशियर में पाकिस्तान के जबड़े से दुर्गम दुर्मुख पोस्ट को छीनकर ईद मनाने वाले सैनिकों में नीवेंद्र सिंह भदौरिया शामिल थे। उनकी वीरगाथा रुदमुली की गलियों में आज भी नई पीढ़ी में देशभक्ति का जोश भर देती है। जुलाई 2002 से जुलाई 2003 तक यूएन मिशन पर शांति बहाली के लिए इथोपिया में रहे हवलदार नीवेंद्र सिंह भदौरिया ने कैप्टन हनीफ उद्दीन के नेतृत्व में कारगिल ग्लेशियर में दुर्गम दुर्मुख चोटी पर सांस रोक देने वाले हालात में चढ़ाई की थी। गांव के युवा और बुजुर्ग बताते हैं कि ईद का दिन था। दोपहर को ग्रेनेड से पाक टीम के बंकर पर हमला बोला था। जिस पर पाक सैनिक दुमदबा कर भाग खड़े हुए। उसके बाद भारतीय सैनिकों ने उनके ही हथियारों से गोलीबारी की और पोस्ट पर कब्जा कर तिरंगा फहराकर ईद मनाई। पाक कब्जे से दुर्मुख चोटी को छीनने की जंग कैप्टन हनीफ के नेतृत्व में लड़ी गई थी। दुर्मुख इलाके को जीतने के बाद कैप्टन हनीफ समेत तीन जवान शहीद हो गए थे। रुदमुली के ग्राम प्रधानपति जोगेंद्र सिंह चौहान कहते हैं कि कारगिल जंग की जीत का हर लम्हा आंखों के सामने आते ही सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। ब्रिगेडियर समीर भदौरिया, हवलदार नीवेंद्र सिंह भदौरिया समेत रुदमुली के सात रणबांकुरे कारगिल जंग में लड़े थे। इससे पूर्व पहले विश्व युद्ध में बाह क्षेत्र के 82 सपूतों ने भाग लिया। छह शहीद हुए। दूसरे विश्व युद्ध में 90 जवान शामिल हुए थे। चार शहीद हुए। 1947-48 के कश्मीर युद्ध में 52 में से दो जवान शहीद हुए थे। 1962 में रघुवीर सिंह, 1965 में बृजराज सिंह, 1971 में जसकरन सिंह शहीद हुए। गांव रुदमुली के लोगों ने शहीद स्मारक बनवाकर उनकी यादों को सहेजा है, लेकिन सरकार गांव रुदमुली को पहचान दिलाने के लिए शहीद द्वार तक नहीं बनवा सकी है।
शहीद महेश दीक्षित का स्मारक उपेक्षा का शिकार
देश की रक्षा करते हुए कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए महेश दीक्षित का स्मारक आज भी सरकारी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। शहीद के परिजन का आरोप है कि बलिदान के वर्षों बाद भी उन्हें सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं मिली। महेश दीक्षित, पुत्र नरेंद्र, बीएसएफ की 52 वीं बटालियन में तैनात थे। वह थाना अछनेरा क्षेत्र के गांव कचौरा के निवासी थे। 7 नवंबर 2001 को जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग क्षेत्र में ड्यूटी के दौरान देश की रक्षा करते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया। परिजन का कहना है कि शहीद की प्रतिमा भी सरकारी स्तर पर स्थापित नहीं कराई गई। उन्होंने अपने निजी खर्च से प्रतिमा बनवाकर स्मारक स्थल पर स्थापित कराई। उनका आरोप है कि आज तक स्मारक के विकास और रखरखाव के लिए भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
जितेंद्र सिंह की शहादत को सलाम, विकास की राह अब भी अधूरी
कारगिल युद्ध में देश की रक्षा करते हुए बलिदान देने वाले नायक जितेंद्र सिंह चौहान की वीरता पर आज भी पूरा टीकतपुरा-खंडेर गांव गर्व करता है। हालांकि, शहीद का गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं और विकास की बाट जोह रहा है। परिजन का कहना है कि सरकारें शहीदों के सम्मान की बातें तो करती हैं, लेकिन उनके गांव की बदहाली आज भी नहीं बदली। तहसील फतेहाबाद क्षेत्र के गांव टिकतपुरा-खंडेर निवासी नायक जितेंद्र सिंह चौहान वर्ष 1995 में भारतीय सेना की 5 पैरा रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। कारगिल युद्ध के दौरान 21 जुलाई 1999 को ऑपरेशन में अदम्य साहस का परिचय देते हुए उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी पत्नी सुमन चौहान ने गांव में अपनी भूमि पर शहीद का स्मारक बनवाया है। वर्तमान में वह आगरा के ताजनगरी फेस-1 में रहती हैं। सरकार की ओर से परिवार को पेट्रोल पंप सहित अन्य सुविधाएं भी प्रदान की गई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कारगिल के इस वीर सपूत की शहादत पूरे क्षेत्र के लिए गौरव की बात है। यदि गांव में सड़क, जलनिकासी, प्रकाश व्यवस्था और शहीद के नाम का प्रवेश द्वार जैसी सुविधाएं विकसित की जाएं, तो यह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। शहीद के परिवार के भाई रामहेत चौहान ने बताया कि बाह-फतेहाबाद मार्ग पर गांव के मोड़ पर शहीद जितेंद्र सिंह के नाम का साइन बोर्ड लगाया जाए, ताकि आने-जाने वाले लोगों को पता चल सके कि इसी गांव का लाल कारगिल में देश के लिए शहीद हुआ था। शहीद के भतीजे बृजेश चौहान ने बताया कि शहीद स्मारक पर लगी स्ट्रीट लाइट लंबे समय से खराब पड़ी है। शाम ढलते ही स्मारक अंधेरे में डूब जाता है। स्मारक पर पानी की टंकी की व्यवस्था नहीं है और सामने बारिश का गंदा पानी जमा रहता है।
युद्ध में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हुए थे श्यामवीर सिंह चाहर
कारगिल युद्ध में पाकिस्तान से लोहा लेते हुए क्षेत्र के लाल नायक श्यामवीर सिंह चाहर ने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। ग्राम पंचायत अकोला के मजरा नगला जयराम निवासी श्यामवीर सिंह चाहर 17 रेजिमेंट में नायक के पद पर तैनात थे। जब 1999 में कारगिल में पाकिस्तानी सेना ने युद्ध छेड़ा तो श्यामवीर सिंह भी मोर्चे पर डट गए। 9 जुलाई 1999 को कारगिल की ऊंची चोटियों पर लड़ते हुए उन्होंने कई दुश्मनों को मौत के घाट उतारा और इसी दौरान वीरगति को प्राप्त हो गए। शहीद की याद में सरकार द्वारा परिजनों को एक पेट्रोल पंप आवंटित किया गया था।
थ्री पिंपल्स पर तिरंगा फहराने में वीरगति को प्राप्त हुए थे वीर चक्र विजेता हवलदार कुमार सिंह
कारगिल विजय दिवस पर देश जहां अपने वीर सपूतों के अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान को नमन कर रहा है, वहीं ग्राम बसेरी काजी भी अपने वीर सपूत वीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित हवलदार कुमार सिंह सोगरवल को श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में ऑपरेशन विजय के दौरान द्रास सेक्टर की मश्कोह घाटी स्थित दुर्गम थ्री पिंपल्स (पिंपल-1 और पिंपल-2 सहित) चोटियों को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया था।
बसेरी काजी निवासी कुमार सिंह वर्ष 1978 में भारतीय सेना की 17 जाट रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। कारगिल युद्ध के दौरान उनकी टुकड़ी को मश्कोह घाटी की रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चोटियों पर कब्जा करने का जिम्मा सौंपा गया। भारतीय जवानों ने दुश्मन के कई सैनिकों को मार गिराया और अंततः थ्री पिंपल्स की चोटियों पर तिरंगा फहरा दिया। इसी दौरान बंकर में छिपे एक पाकिस्तानी सैनिक की गोली लगने से हवलदार कुमार सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए। शहीद के पुत्र सतेंद्र कुमार ने बताया कि वर्ष 2021 में परिवार ने अपने खर्च से गांव बसेरी काजी में शहीद स्मारक का निर्माण कराया, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान से प्रेरणा ले सकें। वीर नारी बलबीरी देवी ने बताया कि मेरे पति कारगिल युद्ध में देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए थे। उनकी शहादत को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
गहर्रा कलां के हसन मोहम्मद ने दुश्मन को खदेड़ते हुए दी थी शहादत
गहर्रा कलां निवासी हसन मोहम्मद दुश्मन को खदेड़ते हुए 3 जुलाई 1999 को शहीद हुए थे। हसन मोहम्मद के परिवार को भी पेट्रोल पंप मिला। जो कि आगरा में कारगिल पेट्रोल पंप के नाम से मशहूर है। कारगिल शहीद हसन मोहम्मद का परिवार सेक्टर 5 आवास विकास कॉलोनी में रहता है। परिवार ने बड़े अरमानों के साथ बड़े बेटे हसन मोहम्मद के सर पर सहरा बांधा था। 3 महीने बाद ही कारगिल युद्ध चढ़ गया। हसन मोहम्मद भी अपनी यूनिट के साथ पाकिस्तानी घुसपैठियों को सबक सिखाते हुए देश पर कुर्बान हो गए। हसन के भाई फरियाद खान कहते हैं कि भाई के जाने के बाद भाभी ने उनके परिवार को भी अपना परिवार माना।
शहीद नारायण सिंह का समाधि स्थल आज भी उपेक्षा का शिकार
केंद्र सरकार की ओर से पाकिस्तान के विरुद्ध चलाए गए ऑपरेशन विजय 2000 के दौरान पुंछ सेक्टर में बम विस्फोट के दौरान शहीद हुए सैंया के नारायण सिंह का समाधि स्थल आज भी उपेक्षा का शिकार है। शहीद के पुत्र संतोष कुमार बताते हैं कि शहीद पिता नारायण सिंह की प्रतिमा उन्होंने निजी खर्चे पर बनवाकर स्थापित कराई है, परंतु शहीद स्थल पर सरकार की ओर से कोई भी विकास कार्य नहीं कराया गया।समाधि स्थल पर लाखों रुपये खर्च कर मिट्टी डलवाकर गड्ढों को भरवाया गया था।