महाशिवरात्रि: कांवड़ियों का रैला
बटेश्वर। महाशिवरात्रि पर भोले के अभिषेक के लिए शनिवार से ही कांवड़ियों का सैलाब उमड़ा शुरू हो गया। सोरों से कांवड़ लेकर पहुंचे श्रद्धालुओं के कंधों पर आस्था और श्रद्धा कांवड़ के रूप में झूलती नजर आयी, तो भोले के भक्तों की जुबां पर थे हर-हर, बम-बम भोले के जयकारे। बृह्म मुहुर्त में भोले के अभिषेक का सिलसिला शुरू हो गया। भोले की नगरी में पूरी रात भजन कीर्तन की गूंज सुनाई देती रही। ब्रह्मलाल महाराज मंदिर सहित सभी मंदिर रोशनी से झिलमिलाते नजर आए।
महाशिवरात्रि पर्व पर उत्तर भारत का प्रसिद्ध तीर्थ बटेश्वर पूरी तरह भोले की भक्ति में रंगा नजर आया। शनिवार सुबह से सोरों से कांवड़ लाने वाले शिव भक्तों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। बटेश्वर से जुड़ने वाली शिकोहाबाद की सड़क पर कांवड़ियों का रेला उमड़ पड़ा। बिना रुके, बिना थके। न दिन की चिंता न रात का भय। कदम से कदम मिलाते कांवड़िये सैकड़ों किमी की पैदल दूरी तय कर भोले के दर पर पहुंचे। देर रात को तीर्थ में शिवभक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। कंधे पर कांवड़ लिए हजारों कांवड़ियों की तीन किमी. लंबी लाइन लग गई। बृह्म मुहुर्त में ब्रह्मलाल महाराज मंदिर में भगवान शिव के अभिषेक का सिलसिला शुरू हो गया। हरिद्वार, ऋषिकेश, सोरों से हथेश्वरी, कंधेश्वरी और डाक कांवड़ लेकर पहुंचे श्रद्धालुओं के बम, बम भोले के जयकारों से बटेश्वर रात भर गूंजता रहा। मंदिर प्रबंधक अजय भदौरिया ने बताया कि शनिवार आधी रात को ब्रह्मलाल महाराज मंदिर के पट खोल दिए गये। कांवड़ियों ने घंटों की घनघनाहट और बम भोले के घोष के साथ ब्रह्मलाल महाराज का गंगाजल से अभिषेक शुरू किया, जो रविवार रात तक जारी रहेगा।
महाभारत काल में पांडवों ने बटेश्वर में कांवड़ चढ़ाई थी। वह भोलेनाथ के अभिषेक के लिये सोरों से कांवड़ में गंगाजल भरकर लाये थे। एक किवदंती के मुताबिक अज्ञातवास में अपनी पहचान छिपी रहने के लिये उन्होंने कांवड़ चढ़ा कर शिव का आर्शीवाद लिया था। मंदिर के पुजारी जयप्रकाश गोस्वामी ने बताया कि तभी से बटेश्वर में कांवड़ चढ़ाने की परम्परा चली आ रही है।