अपराजिता अभियान के तहत कार्यालय में बेटियां
- फोटो : अमर उजाला
हैदराबाद में डॉक्टर बिटिया से दुष्कर्म बाद हत्या से शहर की बेटियों का आक्रोश फूट पड़ा। सोमवार को अमर उजाला के अपराजिता अभियान के तहत कार्यालय में बेटियों ने समाज और अभिभावकों को भी कटघरे में खड़ा किया। सभी का मानना था कि बेटियों पर पाबंदी और बेटों को कुछ भी करने की आजादी, महिलाओं पर अपराध की बड़ी वजह बनती है।
पीड़ित होने पर भी समाज लड़कियों पर अंगुली उठाता है। यह सोच बदलनी होगी। लड़कों को जब तक उनकी हद नहीं बताई जाएगी, यौन अपराध ऐसे ही बढ़ते रहेंगे। मां-बाप का पहली जिम्मेदारी है कि वह बेटों को महिलाओं का सम्मान करने की शिक्षा दें।
पहली गलती होने पर उनका पक्ष न लेकर खिलाफ खड़े हों। पुलिस-प्रशासन और सरकार को भी आड़े हाथ लिया। कहा कि मामले की जांच और सजा में देरी से भी अपराधों को बढ़ावा मिलता है। राजनीतिक बयानबाजी के बजाए कानून व्यवस्था मजबूत करने पर जोर देना चाहिए।
शबाना अली
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यह बोली बेटियां: घटना के बाद ही पुलिस-प्रशासन हरकत में आता है। अगर 24 घंटे सतर्कता बरतें तो ऐसे अपराध न के बराबर रह जाएंगे। सरकार को भी चाहिए कि कोरे बयानबाजी के बजाय कानून व्यवस्था को सख्त करे। लड़के देर से आएं तो उनसे भी हो -अलका सिंह
- लड़कियों को शुरू से ही चुप रहने की सीख दी जाती है। लड़के देर से आएं, गलत कार्य करें तो बेटा है कहते हुए मां-बाप सपोर्ट करते हैं। यही सोच लड़कों को अपराध के लिए प्रेरित करते हैं। बेटों से भी टोकाटाकी हो।
सार्वजनिक स्थानों पर दी जाए फांसी: नंदिनी ठाकुर
- दुष्कर्मियों को सार्वजनिक स्थानों पर फांसी दी जानी चाहिए। ऐसा करने से औरों के दिल में भी कानून का डर बैठेगा। - बेटा-बेटियों को उच्च शिक्षा पर हो जोर: हुर्मि वहाब अपराध के पीछे अशिक्षा भी एक वजह है। ऐसे में अभिभावकों को चाहिए कि बेटा और बेटियों को उच्च शिक्षित किया जाना चाहिए। शिक्षित लोग बुरा-भला का आकलन बेहतर ढंग से कर सकते हैं। लड़कों को भी उनकी हद बताई जाए: आराध्या उपाध्याय
- बेटियों से घर देर से आने पर जैसे मां-बाप सवाल-जवाब करते हैं। अगर यही लड़कों से की जाए तो काफी हद तक दुष्कर्म, छेड़छाड़ जैसी घटनाएं कम होंगी। बेटों को भी संस्कारवान बनाना बेहद जरूरी है। फांसी से पहले किया जाए प्रताणित: पिंकी राजपूत
- दुष्कर्मियों को फांसी देने से पहले उसको प्रताणित किया जाना चाहिए। जिससे अपराधी को पीड़िता पर की गई हैवानियत का एहसास हो और वह अपनी मौत को गिड़गिड़ाए। तभी मृतक की आत्मा को शांति मिले। दुष्कर्मी का जेंडर ही बदल देना चाहिए: सोनी राजपूत
- दुष्कर्म करने वालों का जेंडर ही बदल देना चाहिए, जिससे वह लड़कियों की पीड़ा को समझ सके। जब उसे पीड़ा का एहसास होगा तो और लोग भी इस सजा के डर के कारण अपराध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे। सजा में देरी से अपराधियों के बढ़ते हौसले: साक्षी वर्मा
- दुष्कर्म की जांच और सजा में देरी भी अपराध को बढ़ावा देती है। दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों की जांच तेजी से की जाए, कोर्ट में भी इन मामलों को प्राथमिकता तय करते हुए रोज सुनवाई कर जल्द सजा दी जानी चाहिए। दुष्कर्मियों को सजा देने का महिलाओं को मिले अधिकार: जाह्नवी उपाध्याय
- दुष्कर्मियों को सजा तय होने के बाद महिलाओं को सौंप दिया जाए। महिलाएं अपने स्तर से उसे सजा देंगी, जिससे वह पीड़िता पर हुए जुल्म का उसे एहसास करा दें। उनको भी दुष्कर्मी को दंड देने पर सुकून मिलेगा।
फिल्म-विज्ञापन में अश्लीलता से बढ़े मामले: लवली परिहार
- फिल्म, सीरियल और विज्ञापन में अश्लीलता और फूहड़ता चरम पर है। इससे मानसिक विकृतियां पनप रही हैं। सरकार को चाहिए कि इनको रोकने के लिए सख्त नियम बनें, इससे काफी हद तक यौन हिंसा कम होगी।
इंटरनेट पर बंद हो अश्लील सामग्री: अल्पी अग्रवाल
- सोशल मीडिया, इंटरनेट पर अश्लील सामग्री पर रोक लगाई जाए। ऐसी साइट बंद कर देनी चाहिए। मोबाइल फोन में अश्लीलता सामग्री आसानी से मिलने से मानसिक विकृतियां हो रही हैं और दुष्कर्म बढ़ रहे हैं।
खुद की सुरक्षा करें, न करें किसी भी भरोसा: अमरीन
सरकार-पुलिस के भरोसे पर रहने से बेहतर है कि महिलाएं खुद जागरूक हाें। सगे-संबंधी और बाहरी लोगों पर आंख बंद कर भरोसा नहीं करना चाहिए। जरा सा भी गलत होने की आशंका हो तो सतर्क हो जाना चाहिए।
छेड़छाड़ होने पर आसपास के लोग भी करें विरोध: दीक्षा कुशवाहा
- रास्ते, चौराहा, बाजार या फिर अन्य स्थानों पर अगर लड़कियों के साथ छेड़छाड़ हो रही है तो आसपास के लोगों को भी विरोध करना चाहिए। इससे अपराधियों के हौसले कमजोर पड़ेंगे, ऐसा करने पर उनमें डर भी होगा।
बेटों की गलती पर मां-बाप न दें साथ: शंकरी
गलती करने पर लड़कों को मां-बाप का साथ मिल जाता है, अपराध की यहीं शुरूआत हो जाती है। अभिभावकों को बेटों का साथ न देकर उसको गलत-सही समझाएं, न मानने पर दंडित भी करवाएं।
सजा में देरी से कानून का भय खत्म: रिचा शर्मा
- अपराध के बाद सजा मिलने में कई साल लग जाते हैं। इससे अपराधी के मन में सजा का डर खत्म हो जाता है। दुष्कर्म के मामले में जांच और सजा जल्द दी जाए, जिससे दुष्कर्मियों में कानून का खौफ बना रहे।
बेटी को चुप रहने की नहीं दी जाए शिक्षा: संगीता
- बेटी को शुरू से ही बर्दास्त और चुप रहना सिखाया जाता है। ऐसे में उनके साथ अपराध होेने पर भी समाज का हवाला देकर अभिभावक चुप रहने को कहते हैं, लेकिन बेटियां चुप नहीं रहें और खुलकर विरोध करें।
बच्चों को शुरू से बनाएं संस्कारवान: पूजा यादव
- बेटा-बेटी को शुरू से ही संस्कारवान बनाया जाए। उनको नैतिक मूल्य और सामाजिक दायित्व बताए जाएं। स्कूल भी यह जिम्मेदारी समझें। इससे बड़े होने पर मानसिक रूप से एकदूसरे का सम्मान करना सीखेंगे।
पुलिस को तत्काल करें फोन: मोहिनी
- महिलाएं अपनी सुरक्षा के लिए जागरूक रहें। कहीं पर भी अपने साथ अपराध होने की आशंका है और असहज हैं, तो तत्काल पुलिस को सूचित किया जाना चाहिए। ऐसा होने से अपराध की घटनाएं कम होंगी।
दया याचिका का न मिले अधिकार: चंद्रकांता सत्संगी
- सामूहिक दुष्कर्म और जलाकर हत्या, सुनकर ही रूह कांप रही है। ऐसे अपराधियों को तो सजा के बाद सीधे फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए। राष्ट्रपति के नाम दया याचिका का भी अधिकार नहीं मिलना चाहिए।
जूडो-कराटे का लें प्रशिक्षण: प्रिया सिंह
- दूसरों पर निर्भर रहने से बेहतर है कि खुद भी सक्षम बनें। अपराधियाें से निपटने के लिए हर महिला को आत्म रक्षा के लिए जूड़ो कराटे सीखने चाहिए। मां-बाप को भी बेटियों को आत्मरक्षार्थ का प्रशिक्षण दिलवाना चाहिए।
बेटों की हरकतों पर नजर रखें अभिभावक: पल्लवी खोबरा
जिस तरह से बेटियों पर मां-बाप नजर रखते हैं, ऐसे ही बेटों पर भी अभिभावक नजर रखें। वह बाहर जाकर क्या हरकत कर रहे हैं, इसकी भी पता करें। शिकायत आने पर उसको हल्के में न लेकर बेटों पर सख्ती बरतें।
कपड़े नहीं लोगों की मानसिकता हुई छोटी: रश्मि राजपूत
- कपड़े छोटे थे, घर से रात में अकेली क्यों गई। ऐसी टिप्पणी और सोच समाज के लिए खतरनाक है। किसी बेटी के कपड़े छोटे नहीं लोगों की मानसिकता छोटी हुई है। बच्चियों के साथ दुष्कर्म इसका साक्षात उदाहरण है।