आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री और बच्चों में चाचा के रूप में विख्यात जवाहरलाल नेहरू के जन्म और मृत्यु से मथुरा का गहरा नाता है। उनकी मां स्वरूपा रानी ने पुत्र प्राप्ति के लिए मथुरा में यमुना के किनारे कल्पवास कर अनुष्ठान किया था। जब जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु हुई तो परिजनों ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यमुना के विश्राम घाट पर उनकी अस्थियों का विसर्जन कराया।
नेहरू परिवार के पुरोहित रहे रविंद्रनाथ चतुर्वेदी की बुजुर्ग मां महारानी देवी ने बताया कि 1888 में जवाहरलाल नेहरू की मां स्वरूपा रानी ने पुत्र प्राप्ति के लिए मथुरा में कल्पवास किया था। इस कठिन अनुष्ठान में वह 30 दिन यमुना के किनारे रहीं और सात्विक जीवन जीया।
1889 में जवाहरलाल नेहरू के जन्म के बाद पिता मोतीलाल नेहरू गदगद थे। उन्होंने यमुना किनारे तालाब गली में कश्मीरी धर्मशाला का निर्माण कराया, जो आज भी जर्जर हालत में मौजूद है। वर्ष 1964 में जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ तो उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित सहित परिजनों ने उनकी अस्थि विसर्जन के लिए मथुरा को चुना।