कालिंदी अवैध निर्माणों से आखिर मुक्त हो भी तो कैसे। सिंचाई विभाग पिछले दो महीने में नदी का डूब क्षेत्र नहीं ढूंढ पाया है। इस दरमियान अधिकारियों की टोली कई बार दयालबाग से बल्केश्वर तक यमुना की तलहटी की धूल फांक चुकी है। मगर, नतीजा सिफर ही रहा है। डूब क्षेत्र निर्धारण को लेकर खुद की गर्दन बचाने के लिए अधिकारियों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को भी गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन वह अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाए। अब सिंचाई विभाग फिर से यमुना किनारे दौड़ लगाने की तैयारी कर रहा है।
बता दें कि पर्यावरणविद् डीके जोशी ने यमुना को मूलस्वरूप में लाने के लिए पिछले दिनों एनजीटी में जनहित याचिका दायर की थी। तब से कई बार इस याचिका पर सुनवाई हो चुकी है। इस दौरान एमजीटी ने सिंचाई विभाग को डूब क्षेत्र का पुन: निर्धारण करने को कहा था। मगर, विभाग ने यमुना किनारों पर 50 और 25 साल के दौरान आई बाढ़ के निशान लगाकर आदेश पर अमल की इतिश्री कर दी। जब जवाब दाखिल किया गया तो ट्र्रिब्यूनल ने इस पर आपत्ति जताई। विभाग से डूब क्षेत्र निर्धारण के पिलर लगाने को कहा। इस बार भी सिंचाई विभाग ने खानापूर्ति करते हुए यमुना किनारे चुनिंदा पिलर लगा दिए। मगर, डूब क्षेत्र की दूरी तय नहीं की। हाल ही में हुई सुनवाई के दौरान भी विभाग एनजीटी को गुमराह नहीं कर पाया। उल्टे विभाग को फटकार खानी पड़ी। साफ शब्दों में हिदायत दी कि डूब क्षेत्र की सिर्फ ऊंचाई ही नहीं, दूरी भी तय की जाए। दरअसल, विभाग को जो काम दो महीने पहले करना था, उसको अब शुरू करने की तैयारी कर रहा है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अब 50 और 25 साल के दौरान आई बाढ़ के हिसाब से यमुना किनारे से डूब क्षेत्र की दूरी तय करने के लिए फिर से टीम गठित कर दी गई है। यह टीम जल्द ही काम शुरू करेगी।
बढ़ सकती है कुछ बिल्डरों की मुसीबत
एनजीटी के इस आदेश के बाद उन बिल्डरों की मुसीबत बढ़ सकती है, जिनको बचाने के लिए सिंचाई विभाग ने पूरी कोशिश कर ली थी। क्योंकि विभाग ने सिर्फ नदी किनारे स्थित कुछ निर्माणों पर ही निशान लगाए थे। बाकी को डूब क्षेत्र से बाहर बताया था। डूब क्षेत्र की दूरी तय होती है तो इसमें कई बिल्डरों के निर्माण आ सकते हैं।