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UP: वरदान समझकर जिसे उगाया, वही बन गया 'रक्तबीज'; यमुना और चंबल के बीहड़ में जानें कैसे उगे विलायती बबूल

Sat, 23 May 2026 09:57 AM IST
Dhirendra Singh अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा

सार

यमुना और चंबल के बीहड़ों में दशकों पहले लगाया गया विलायती बबूल अब देसी वनस्पतियों के लिए बड़ा खतरा बन चुका है और इसे हटाने की मांग सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गई है। कभी वरदान माना गया यह पौधा आज पर्यावरण संतुलन बिगाड़ने और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाने का कारण बन गया है।
 
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विलायती बबूल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यमुना और चंबल नदी के बीहड़ में टीलों पर हरियाली के लिए पांच दशक पहले विलायती बबूल (प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा) के बीज डाले गए, वही अब पौधों की देसी प्रजातियों के लिए खतरा बन गया है। मथुरा के पौराणिक 36 वनों को मूल रूप में लाने की योजना के बाद आगरा में सूर सरोवर पक्षी विहार से विलायती बबूल को हटाने की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है। पर्यावरणविद डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य की याचिका पर सोमवार को इस मामले में सुनवाई की जाएगी। पहले यह शुक्रवार को होनी थी, लेकिन इसे अन्य मामलों के कारण सोमवार के लिए टाल दिया गया।
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पर्यावरणविद ने बताया कि विलायती बबूल रक्तबीज की तरह है। इसकी मौजूदगी से अन्य पौधे नहीं पनप पाते। बबूल की फलियों को खाने से इसके बीज मलमूत्र के कारण जहां गिरते हैं, वहां नया पौधा उग आता है। इसी वजह से विलायती बबूल हर जगह खरपतवार की तरह उग आया। इसे सूर सरोवर से हटाने की जरूरत है, ताकि अन्य देसी प्रजाति के पौधों और फलदार वृक्षों के कारण बंदरों की समस्या दूर हो सके।

 

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और केंद्रीय मृदा एवं जल संरक्षण अनुसंधान संस्थान, देहरादून ने आगरा के बीहड़ों में विलायती बबूल पर वैज्ञानिक प्रयोग किए थे। इनमें स्पष्ट है कि विलायती बबूल के कारण भूजल स्तर में तेजी से गिरावट होती है। कांटे होने के कारण पक्षी, तितलियां और अन्य छोटे जीव इसके पास नहीं रह पाते। यह देसी प्रजातियों को पनपने नहीं देता।

 

हरियाली और ईंधन के लिए दिया था बढ़ावा
रेगिस्तान और बीहड़ में पानी की कमी वाले क्षेत्रों में बिना देखरेख के ही बढ़ जाने वाले विलायती बबूल को आजादी से पहले वर्ष 1940 में जोधपुर के महाराजा ने शाही पौधा घोषित कर दिया था। तब इसे थार मरुस्थल के फैलाव को रोकने और ईंधन के लिए लकड़ी मिलने के कारण प्रोत्साहन दिया गया। बीहड़, रेगिस्तान और बंजर जमीनों को तेजी से हरा-भरा करने और मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए आगरा, धौलपुर, मुरैना, हटावा समेत चंबल और यमुना के बीहड़ में हवाई जहाज से बीजों का छिड़काव किया गया था। एरियल सीडिंग के बाद यह तेजी से पनपा और यमुना के खादर और चंबल के बीहड़ में हरियाली हो गई। हालांकि इसने स्थानीय प्रजातियों धौ को पूरी तरह से खत्म कर दिया।

 

हवाई जहाज से गिराते देखा था बीज
पर्यावरणविद संतोष जिंदल ने बताया कि हमने 1970 के दशक में विलायती बबूल के बीजों को हवाई जहाज से गिराते हुए देखा है। यह तब वरदान था, लेकिन अब यह पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है। इसकी जगह पीपल, बरगद, पाकड़, आम जैसे देसी पौधे लगें, जिससे पर्यावरण सुधरे। - 
 
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देसी प्रजाति से बदलाव
एएसआई के  पूर्व निदेशक उद्यान हरबीर सिंह ने बताया कि विलायती बबूल को हटाकर हमने सिकंदरा में प्रयोग किया था। अब हाईवे से स्मारक के बीच लगाए गए देसी पेड़ धूल कणों पर नियंत्रण के साथ पूरे वातावरण को बदल चुके हैं। सिकंदरा के गेट के सामने का यह हिस्सा नजीर है कि बबूल की जगह देसी प्रजातियों से कितना बदलाव आता है। 
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