कभी घूंघट की आड़ में रहने वाली महिलाओं ने नई उड़ान के लिए अपने पंख खोल दिए हैं। वे चूल्हे चौके से बाहर निकलकर अपने हौसले से आसमान की ऊंचाइयों को छूने के लिए बेताब हैं। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं ने भी अपने भीतर शायद इसी हौसले को जिंदा कर लिया है। अब वे रोजगार के क्षेत्र में उपलब्धियां हासिल कर नई इबारत लिख रही है।
ग्रामीण क्षेत्र में अक्सर महिलाएं घर की दहलीज के बाहर कदम तक नहीं रखती हैं, लेकिन आज ये महिलाएं असंभव को भी संभव कर दिखा रही हैं। बिना शिक्षा और पूंजी के भी उन्होंने रोजगार के नए आयाम स्थापित किए हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर उन्होंने अपनी जिंदगी ही बदल ली है।
मैनपुरी जिले के गांवों में घरेलू महिलाएं एकजुट होकर स्वयं सहायता समूह का निर्माण कर रही हैं। इन महिलाओं ने थोड़ी-थोड़ी बचत कर बड़ी धनराशि इकट्ठा की। इससे उन्होंने कोई छोटा काम जैसे सिलाई, पशुपालन, दुकान संचालन, भैंस पालन, सब्जी की दुकान आदि की शुरुआत की।
इन महिलाओं ने पेश की मिसाल
जिले में तमाम काम धंधों को महिलाओं द्वारा न केवल सफल संचालन हो रहा है बल्कि दूसरी महिलाओं को भी इससे रोजगार मिल रहा है। जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर हजारों महिलाओं ने न केवल अपना बल्कि अपने परिवार का भी जीवन बदल दिया है।
निशा बनीं ब्लॉक रिसोर्स पर्सन
गांव नगला महानंद निवासी निशा पाल ने एक स्वयं सहायता समूह बनाकर पुस्तक भंडार खोला था। धीरे-धीरे आमदनी बढ़ी तो उन्होंने एक दर्जन से अधिक महिलाओं को इसमें जोड़ लिया। इसके बाद उनकी मेहनत को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में ब्लॉक रिसोर्स पर्सन चुना गया। आज वे गांवों में जाकर महिलाओं को प्रशिक्षण देती हैं।
कुसमा ने लिखी कामयाबी की इबारत
सैदपुर बघौली निवासी कुसमा देवी ने जब स्वयं सहायता समूह की शुरुआत की थी तो लोग इसे मजाक समझ रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने बचत की।
इसके बाद बकरी पालन शुरू किया। धीरे-धीरे मुनाफा होता गया और बकरी पालन बढ़ता गया। आज तीन साल में ही उनके पास आधा सैकड़ा बकरियां।
इनसे उन्हें चार से पांच लाख रुपये की आमदनी सालाना होती है।
ये होता है स्वयं सहायता समूह
गांव की 12 महिलाएं मिलकर एक समूह का गठन कर उसे नाम देती हैं। इसके बाद वे समूह के नाम से ही बैंक में एक खाता खुलवाती हैं। इसके बाद वे अपनी अल्प आय में से ही छोटी बचत कर उस खाते में जमा कर देती हैं। जब ये धनराशि अधिक हो जाती है तो समूह की किसी एक महिला को कारोबार शुरू करने के लिए दे दी जाती है।
धीरे-धीरे जब कारोबार बढ़ जाता है तो तीन माह बाद 15 हजार रुपये का रिवॉल्विंग फंड स्वयं सहायता समूह को दिया जाता है। इसके बाद छह माह के बाद कम्यूनिटी इन्वेस्टमेंट फंड के रूप में 1.10 लाख रुपये की मदद भी दी जाती है। इससे समूह को गति मिलती है और कारोबार भी बढ़ जाता है।
जिले में समूहों पर एक नजर
- 3387 स्वयं सहायता समूह संचालित हैं।
-37257 महिलाओं को रोजगार मिल रहा है।
-3387 समूहों को रिवॉल्विंग फंड मिल चुका है।
-149 ग्राम संगठनों को सीआइएफ निधि मिल चुकी है।