मथुरा के राधाकुंड को लेकर मान्यता है कि अहोई अष्टमी की मध्यरात्रि को विशेष स्नान सैकड़ों दंपति के जीवन में खुशियां भर देता है। यहां देश के कोने-कोने से बड़ी संख्या में पति-पत्नी संतान प्राप्ति की इच्छा लेकर आते हैं। इस पर्व में शामिल होते हैं और विधि विधान से पूजा अर्चना कर मुंह मांगी मुराद पाते हैं।
लोगों की अटूट आस्था है कि राधाकुंड में लगने वाले अहोई अष्टमी मेले में जो दंपति विशेष स्नान पर्व पर हाथ पकड़कर राधाकुंड में डुबकी लगाते हैं, उन्हें संतान की प्राप्ति का सुख मिलता है। अहोई माता महिलाओं की सूनी गोद भरती हैं। किंवदंती है कि भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर काल में राधाकुंड और श्याम कुंड का निर्माण किया था।
मान्यता है कि भगवान ने ब्रजवासियों के कहने पर वचन दिया था जो भी राधाकुंड और श्याम कुंड में स्नान करेगा उसकी मन की इच्छाएं पूर्ण होंगी। कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को राधाकुंड में स्नान का विशेष पर्व मनाया जाता है।
दंपति साथ में स्नान करते हैं और राधाजी की पूजा कर वंशवृद्धि का वरदान प्राप्त करते हैं। इस बार अहोई अष्टमी का महा स्नान गुरुवार 12 अक्टूबर की मध्य रात्रि को होगा।
ये है निर्माण की कथा
राधाकुंड
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बताया जाता है कि 5000 साल पहले मथुरा में कंस का शासन था। कंस ने भगवान कृष्ण का वध करने के लिए अरिष्ठासुर नामक राक्षस को कृष्ण की गाय और बछड़ों के झुंड में बछड़े का रूप धारण कर भेज दिया। अरिष्ठासुर ने कृष्ण को मारने की कोशिश की तो कृष्ण ने राक्षस रूप धरे बछड़े का वध कर दिया।
बछड़े का वध करने पर कृष्ण को गोहत्या का पाप लगा। गोहत्या के पाप से मुक्त होने को गुरुदेवताओं ने संसार के तीर्थों का भ्रमण करने और स्नान करने को कहा। इस पर भगवान कृष्ण ने अहोई अष्टमी के दिन अपनी बांसुरी से कृष्ण कुंड को खोदा और संसार के देवतीर्थों को बुलाकर खुद जल से स्नान कर गोहत्या के पाप से मुक्ति पाई।
राधारानी ने कंगन से खोदा कुंड
इसी प्रकार राधारानी ने अपने कंगन से दूसरा कुंड बनाया। कृष्ण ने उस कुंड का नाम राधाकुंड रखा। राधारानी के आग्रह करने पर भगवान श्रीकृष्ण ने राधाकुंड और कृष्ण कुंड का मिलन कराया। देवतीर्थों को भगवान कृष्ण द्वारा वरदान दिया जो भक्त निष्काम भाव से राधा व कृष्ण कुंड में स्नान करेगा उसकी मनोकामना पूर्ण होंगी।