भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने खरीफ सीजन से पहले खेती की सेहत सुधारने का अभियान शुरू किया है। इसका उद्देश्य उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल पर रोक लगाना है।
कृषि विज्ञान केंद्र बिचपुरी के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि खेतों में यूरिया और डीएपी का अत्यधिक उपयोग हो रहा है। इससे मिट्टी की उर्वरता घट रही है और उत्पादन लागत बढ़ रही है। आईसीएआर ने 24 मार्च को हुई बैठक में इस समस्या को गंभीर माना। देशभर में यह अभियान 15 ब्लॉकों के सभी गांवों में चलेगा।
किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर खाद डालने की सलाह दी जाएगी। जैव उर्वरक, हरी खाद और फसल अवशेषों के बेहतर उपयोग पर भी जोर रहेगा। लीफ कलर चार्ट जैसी तकनीकों से नाइट्रोजन की जरूरत समझाई जाएगी। इससे खाद की बर्बादी रुकेगी, लागत घटेगी और उत्पादन बढ़ेगा। साथ ही पर्यावरण पर पड़ रहा दबाव भी कम किया जा सकेगा।
इस अभियान में कृषि विज्ञान केंद्र, आईसीएआर संस्थान, कृषि विश्वविद्यालय, एटीएमए और किसान उत्पादक संगठनों की संयुक्त भागीदारी रहेगी। उन्होंने किसानों से अपील की है कि वे बिना जांच के खाद डालने की पुरानी आदत छोड़ें और पहले मिट्टी की जरूरत समझें, फिर खाद दें के सिद्धांत को अपनाएं।