साइबर ठग बैंक अधिकारी बनकर मोबाइल पर एपीके फाइल डाउनलोड कराते थे। रात 12 से 2 बजे के बीच मोबाइल का एक्सेस प्राप्त कर खाते खाली कर देते थे। मोबाइल पर आए ओटीपी को भी डिलीट कर देते थे। दयालबाग के सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी से 15 लाख रुपये की साइबर ठगी इसी तरह हुई थी। गिरोह के दो सदस्यों को शुक्रवार को साइबर क्राइम थाने की पुलिस ने गिरफ्तार किया।
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इनमें सागर, मध्य प्रदेश निवासी बीआर्क का छात्र देवेश भी शामिल है। वह आर्किटेक्ट बनने के बजाय साइबर ठग बन गया। गिरोह का मास्टरमाइंड गोल्डी सागर का बड़ा बिल्डर है। पुलिस उसकी तलाश में लगी है। वह विदेश में रकम डाॅलर में परिवर्तित कर क्रिप्टोकरेंसी खरीद लेता है। नोडल अधिकारी साइबर क्राइम एडीसीपी आदित्य सिंह ने पुलिस लाइन में इस बारे में बात की।
उन्होंने बताया कि अगस्त माह में दयालबाग निवासी पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी राजेंद्र प्रसाद शर्मा से कॉल कर धोखाधड़ी की गई थी। उनसे कहा गया था कि क्रेडिट कार्ड का सत्यापन करना है। व्हाट्सएप पर एक एपीके फाइल भेजी। उसे डाउनलोड कर पढ़ने के लिए बोला तो वह झांसे में आ गए। ओपन करते ही आरोपी के पास उनके मोबाइल का एक्सेस पहुंच गया। रात करीब 12 से 2 के बीच आरोपियों ने ई-वालेट और नेट बैंकिंग की जानकारी लेकर खाते से 15 लाख रुपये ट्रांसफर कर लिए। मोबाइल पर आए ओटीपी को भी डिलीट कर दिया। थाना साइबर क्राइम में प्राथमिकी दर्ज की गई। तीन खातों में रकम गई थी। खातों की जानकारी के बाद सागर, मध्य प्रदेश निवासी देवेश यादव और आशीष रजक को गिरफ्तार किया गया।
मोबाइल में मिली 40 डेबिट कार्ड की जानकारी
एडीसीपी ने बताया कि 2 लाख रुपये सागर, एमपी के मनीष यादव के खाते में ट्रांसफर हुए थे। उसका खाता कोटक महिंद्रा बैंक में था। उसकी गिरफ्तारी के प्रयास किए, लेकिन वो मिला नहीं। मनीष के खाते से रकम सागर के ही देवेश के खाते में गई थी। उसे पकड़ लिया गया। उसके मोबाइल में एपीके फाइल, 30-40 डेबिट कार्ड की जानकारी थी। व्हाट्सएप चैट भी मिली, जिसमें वो खातों की 1 से 5 लाख रुपये रुपये लिमिट की बात कर रहा था।
खुलवाए 80 खाते, सिम भी पास रखते थे
पुलिस ने बताया कि आरोपी आशीष रजक ही खाते उपलब्ध कराता है। देवेश बीआर्क का छात्र है। उसने गवर्नमेंट काॅलेज से आर्किटेक्ट में डिप्लोमा कर रखा है। वह एक काल सेंटर में काम करता था। अपने खर्च पूरे नहीं कर पा रहा था। इससे साइबर ठगी का रास्ता पकड़ लिया। उसे कमीशन मिलता था। एक कंपनी में वर्तमान में ऑनलाइन आर्किटेक्ट का काम करता है। इसके लिए वह ऑफिस नहीं जाता है। पूछताछ में सामने आया कि उन्होंने साइबर ठगी के लिए 70-80 खाते खुलवाए हैं। वह चेकबुक, डेबिट कार्ड, रजिस्टर्ड सिम अपने पास रखते हैं। इन खातों में साइबर ठगी की रकम को ट्रांसफर करते हैं। उन्होंने पिछले छह महीने में 80-90 लाख रुपये की धोखाधड़ी लोगों से कर रखी है। रकम को स्वैप मशीन के माध्यम से विदेश के खातों में ट्रांसफर करते हैं। इसे यूएस डाॅलर में परिवर्तित करते हैं। इसके बाद क्रिप्टोकरेंसी में बदल देते हैं।
मोबाइल की स्क्रीन हो जाती है ब्लैंक
आरेापी देवेश की पहचान इंदाैर के गोल्डी से हुई। वह मास्टरमाइंड होने के साथ ही बिल्डर है। उसके तार झारखंड के जामताड़ा के गिरोह से जुड़े हुए हैं। उसने एक ऑफिस बना रखा है। इसमें पेशेवर युवकों को नाैकरी पर रखता है। उनसे एपीके फाइल बनवाता है। इसके बाद बड़ी संख्या में मोबाइलों पर भेजता है। मोबाइल का एक्सेस मिलने पर हैक कर खाते खाली कर देता है। देवेश आगरा के लोगों को शिकार बनाता था। रात में 12 से 2 के बीच मोबाइल ओपन करने पर स्क्रीन ब्लैंक हो जाती है। इस दाैरान अपने खाताधारक को जोड़ लेते हैं। मोबाइल एक्सेस होने के कारण ओटीपी को डिलीट कर देते हैं। गोल्डी का साथी मनीष भी है।