फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

खयाली जन्नतों में कैसे बैठ जाऊं कैफ ...

Mon, 29 Feb 2016 02:38 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
विज्ञापन
विज्ञापन
अजीब आदमी था वो, मुहब्बतों का गीत था वो, बगावतों का राग था वो, अजीब आदमी था वो... सुप्रसिद्ध लेखक और शायर जावेद अख्तर की हर दिलअजीज आवाज जब डीपीएस स्कूल की फजां में गूंजी तो वहां जमा श्रोताओं की भारी भीड़ के आगे एक चेहरा उभर आया। वह, जिसका मिजाज जब रोमांटिक हुआ तो कलम ने लिखा ‘तुम्हारी जुल्फ के साये में शाम कर लूंगा’ और जब हुकूमत के खिलाफ तेवर बागी हुए लिख दिया ‘खयाली जन्नतों में कैसे बैठ जाऊं कैफ’ और जब देश की सरहद पर वतन के दुश्मनों के लोहा ले रहे जवानों की शहादत को याद किया तो लिखा ‘कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।’
विज्ञापन

जी हां! यह चेहरा था मशहूर शायर कैफी आजमी का। रविवार की शाम डीपीएस स्कूल में ताज लिटरेचर फेस्टिवल के तहत आयोजित कार्यक्रम ‘कैफी और मैं’ में उनकी बेटी व फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी और दामाद व अजीम शायर जावेद अख्तर ने कैफी की शख्सियत का हर रंग पेश किया। शबाना ने मंच पर अपनी मां शौकत को जीवंत किया तो जावेद ने कैफी आजमी को। सारेगामा फेम गायक जसविंदर सिंह ने कैफी की गजलों और नजमों को अपनी मखमली आवाज से सजाकर तस्वीर को सुरीला बना दिया।
 शौकत की कैफी से पहली मुलाकात एक मुशायरे में हुई जब उन्होंने पढ़ा ‘जिंदगी नाम है कुछ लम्हों का’। कैफी (जावेद) ने बताया कि कैसे उनमें शायरी का शौक पैदा हुआ और उनके भाई उन्हें महफिलों में बैठने से रोकने के लिए पान लाने भेज दिया करते थे। तब कैफी अपनी मां से शिकायत की और कहा कि एक दिन में भी बड़ा शायर बनूंगा। उन्होंने लिखा ‘मेरी आवाज सुनो, प्यार का राग सुनो’ शौकत से प्यार हुआ मुहब्बत के नगमे फूटने लगे। कैफी की नज्म ‘औरत’ सुनने के बाद शौकत ने तय कर लिया अब शादी कैफी साथ ही करेंगी। कैफी बंबई (मुंबई) चले गए। शौकत पर पहरा बिठा दिया गया लेकिन बेटी की फरियाद पर पिता का दिल पिघल गया। शौकत को बंबई गए और दोनों का निकाह हुआ। कैफी ने आजादी के आंदोलन में भी दिलेरी से कलम चलाई।
विज्ञापन


बदलते रहते हैं तिजारत के नाते
घर का खर्च चलाने को शौकत ने रेडियो में नौकरी की तो कैफी एक अखबार में पांच रुपये रोज पर नज्में लिखने लगे। बाद में शौकत ने इप्टा ज्वाइन की। इसी बीच कैफी को फिल्मों में गाने लिखने के आफर आए। गुरुदत्त की कागज के फूल के लिए लिखा ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे तुम हम न रहे हम।’ कागज के फूल सहित कई फिल्में फ्लाप हुई तो लोगों ने अनलकी कहकर झटक दिया। जब चेतन आनंद की ‘हकीकत’ और ‘हीर रांझा’ हिट हुई तो इज्जत और शोहरत दोनों कदम चूमने लगे। 9 फरवरी 1971 के  मनहूस दिन कैफी को फालिज मार गई। डिप्रेशन में चले गए तब लिखा ‘जिस्म से रूह तक रेत ही रेत..’ डिप्रेशन से बाहर आए तो लिखा कि ‘तुम इतना जो मुस्करा रहे हो, क्या गम है जिसको छुपा रहे हो।’

जब गांव लौटे कैफी
आजमगढ़ के मिजवां गांव में पैदा हुए कैफी को जब मिट्टी की खुशबू याद आने लगी तो अपने गांव लौट आए। अब गांव के लिए कुछ करना था। गांव में सड़क नहीं थी। तत्कालीन सीएम हेमवतीनंदन बहुगुणा से मिले। उन्होंने भरोसा दिलाया कि दो किलोमीटर सड़क तो दो दिन में बन जाएगी लेकिन सड़क बनने से पहले उनकी सरकार चली गई। इस दौरान पांच हुकूमतें बदल गईं लेकिन सड़क नहीं बनी। मुसीबतों के पहाड़ काटकर उन्होंने गांव को सड़क दिलाई, स्कूल दिए, इंटर कालेज दिए और दिया डिग्री का कालेज का सपना। ‘प्यार का जश्न नई तरह मनाना है, गम किसी के दिल में हर गम को मिटना है’ इसी फलसफे के साथ कैफी दुनिया छोड़ गए। तब शौकत ने आवाज दी ‘जिंदगी उसी तरह चल रही है कैफ, बस तुम नहीं हो।’   
विज्ञापन

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें