होली के रंगों में सराबोर युवक-युवतियां
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आगरा की सेठ गली और फव्वारा बाजार में होली की बात ही निराली होती थी। बात करीब 40 साल पुरानी है। पांच ट्रकों में ड्रमों में पानी भरकर लाते थे। इनमें रंग घोलते और पाइप की मोटी धार से सबको भिगोते। जो ज्यादा देर तक इस मोटी धार को झेलता वह इनाम का हकदार बनता। शाम को सुंदर झांकियां सजाई जातीं।
होली के उल्लास तब हर एक के सिर चढ़कर बोलता था। विशेष प्रतिस्पर्धाएं होती थीं। रंग खेलने, गुझिया खाने...और भी कई। इस मामले में सेठ गली का नंबर सबसे ऊपर आता। क्षेत्र में प्रसिद्ध हनुमान जी के मंदिर पर असली माहौल बनता।
कई-कई दिन पहले से आयोजन की चर्चा होने लग जाती। त्योहार वाले दिन तो सुबह आठ बजे से होली खेलने वालों की भीड़ जुटने लग जाती। इतनी कि पैर रखने की जगह तक नहीं मिलती।
होली खेलने के लिए उमड़ती थी भीड़
स्थानीय लोग बताते हैं कि करीब 50 हजार लोग होली खेलने के लिए मौजूद रहते थे। सुबह 10 बजे के आसपास पांच ट्रकों में बड़े-बड़े ड्रमों में भरकर पानी लाया जाता था। इसमें प्राकृतिक रंग मिलाते। इसके बाद शुरू होती थी प्रतिस्पर्धा। पाइप की मोटी पानी की धार से लोगों को जमकर भिगोया जाता।
यह तब तक होता था जब तक भीगने वाले हार नहीं मान जाते या अपनी जगह से पीछे नहीं हट जाए। जो सबसे अधिक समय तक पाइप से डाली जा रही रंग की धार के आगे जमा रहता उसे पुरस्कृत किया जाता। दोपहर तक यह कार्यक्रम चलता।
सजती थीं मनमोहक झांकियां
सेठ गली से कुछ ही दूरी पर फव्वारा बाजार है। यहां की होली भी अपने आप में अनूठी मानी जाती थी। सुबह सेठ गली से प्रतिस्पर्धा के बाद लोग शाम को यहां जुटते थे। करीब पांच बजे से आकर्षक झांकियां निकाली जाती थीं।
देवी-देवता, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज और अन्य समसामयिक झांकियां पूरे क्षेत्र में भ्रमण करतीं। जहां से गुजरती पुष्पवर्षा की जाती और आरती होती। सड़क के दोनों ओर लोग झांकियां देखने के लिए खड़े रहते।
सुबह से ही डेरा डाल लेते
आगरा व्यापार मंडल के अध्यक्ष टीएन अग्रवाल बताते हैं कि मुझे आज भी सेठ गली की पहले वाली होली याद आती है। हम सुबह से डेरा डाल देते थे। देर हो जाती तो बैठने-खड़े होने की जगह मिलना मुश्किल हो जाता। पांच ट्रंकों में भरकर रंग की बौछार होती थी।
समय के साथ चमक धुंधली पड़ी
कारोबारी कन्हैया लाल राठौर ने बताया कि पहले मनाई जाने वाली होली भूली नहीं जा सकती। फव्वारा से निकलने वाली सुंदर झांकियां आज भी जेहन में आती हैं। समय के साथ त्योहार की चमक धुंधली पड़ती गई।