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हाईकोर्ट ने फांसी की सजा निरस्त की

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मैनपुरी। थाना करहल क्षेत्र में 11 साल पहले पांच साल की बालिका की दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई थी। जिला न्यायालय से सुनाई गई फांसी की सजा को हाईकोर्ट ने निरस्त कर आरोपी को बरी कर दिया है।
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थाना करहल क्षेत्र के एक गांव में 26 अप्रैल 2011 को पांच साल की बालिका की दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई थी। रिपोर्ट बालिका के चाचा ने गांव के ही संतोष के खिलाफ दर्ज कराई थी। मुकदमे की सुनवाई के बाद संतोष को जिला न्यायालय से फांसी की सजा सुनाई गई थी। संतोष ने निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। उसके वकील कुलदीप ने डीएनए मिलान नहीं होने का तर्क देकर आरोपी को सुनाई गई सजा को निरस्त करने की दलील दी। दलील के आधार पर संतोष की फांसी की सजा निरस्त कर उसे दुष्कर्म के बाद हत्या करने के आरोप से बरी कर दिया गया।
पहले भी हो चुकी हैं फांसी की सजा
मैनपुरी। गंभीर अपराधों में जिला एवं सत्र न्यायालय से आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी हैं। हाईकोर्ट में की गई अपील के दौरान सजा को कम किया जा चुका है।
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दिलदहला देनेे वाली गंभीर वारदातों में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में फांसी की सजा तक का प्रावधान है। जिले में पूर्व में हुई इस तरह की वारदातों में जिला एवं सत्र न्यायालय से फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। अपील पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने उनकी सजा कम करके राहत तो दी लेकिन आरोपी अभी भी जेल की सलाखों के पीछे ही हैं। अधिकांश मामलों के आरोपी जमानत नहीं मिल पाने से जेल की सलाखों के पीछे हैं।
थाना औंछा क्षेत्र में एक युवक ने मासूम के साथ दुष्कर्म कर हत्या कर दी। मुकदमे की सुनवाई के दौरान उसे दोषी पाकर तत्कालीन जिल जज विजय लक्ष्मी ने फांसी की सजा सुनाई। हाईकोर्ट में अपील के बाद उसकी सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया।
थाना किशनी क्षेत्र में एक आदमी ने मासूम के साथ दुष्कर्म किया। चीख पुकार पर लोगों को आते देख आरोपी उसकी हत्या कर भाग गया। मुकदमे की सुनवाई केे बाद तत्कालीन स्पेशल जज ईसी एक्ट सरदार अख्तर ने उसे फांसी की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।
थाना भोगांव क्षेत्र में काली नदी किनारे एक युवक ने मासूम के साथ दुष्कर्म कर गला दबाकर हत्या कर दी। मुकदमे की सुनवाई के दौरान उसको दोषी पाकर अपर जिला जज संजीव फौजदार ने फांसी की सजा से दंडित किया। आरोपी द्वारा की गई अपील में हाईकोर्ट ने सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।
नृशंस तरीके से की गई हत्या, मासूम के साथ दुष्कर्म केे बाद हत्या जैसे गंभीर मामलों में न्यायालय द्वारा फांसी की सजा सुनाई जाती है। अपील के दौरान हाईकोर्ट तथ्यों के आधार पर सजा कम कर सकता है।
अनिल कुमार शर्मा, एडवोकेट फौजदारी
गंभीरतम मामलों में सुनाई जाने वाली फांसी की सजा से अपराधियों में दहशत पैदा होती है। इस तरह के मामलों पर अंकुश भी लगता है। गंभीरतम मामलों में अपराधियों को फांसी की सजा होनी ही चाहिए।
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संतोष कुमार यादव राजू, सचिव, बार एसोसिएशन
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