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औषधियों की खेती किसानों को बना रही है समृद्ध

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कासगंज में होती अश्वगंधा औषधि की खेती - फोटो : KASGANJ
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कासगंज। कोरोना संक्रमण ने लोगों को कई सीख भी दी। महामारी के दौर में लोगों ने खेतीबाड़ी के तरीके बदले। रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखने में सहायक मानी जाने वाली औषधियों की खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ा है। बीते एक साल के अंतराल में जिले में औषधियों की खेती का रकबा 40 हेक्टेयर बढ़ा है। किसान औषधि की खेती से लाभ कमाकर आर्थिक रूप से समृद्ध हो रहे हैं।
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महामारी के दौर में लोग इम्युनिटी स्ट्रांग करने के लिए आयुर्वेदिक दवाओं का बहुतायत में प्रयोग कर रहे हैं। इसके चलते किसानों का इनकी खेती के प्रति रुझान बढ़ा है। एक समय था जब जिले में औषधि की खेती शायद ही कोई किसान करता था, लेकिन अब तो तमाम किसान औषधीय गुणों वाले पौधों की खेती कर रहे हैं।
कृषि विभाग ने भी औषधि की खेतीबाड़ी से जुड़े किसानों को जागरूक करना शुरू कर दिया है। फिलहाल जिले के 40 हेक्टेयर रकबे पर औषधि की खेती हो रही है। व्यवसाय से जुड़े किसानों को भी इससे मुनाफा हो रहा है।
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आंकड़े की नजर से-
- जिले के कुल 100 हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाई जा रही औषधि।
- 50 से अधिक किसान औषधि की खेती से जुड़े हैं।
लागत और मुनाफा-
- 12-20 हजार रुपये तक आती है औषधीय फसलों पर प्रति हेक्टेयर की लागत।
- 4-5 लाख रुपये तक प्रति हेक्टेयर औषधि की खेती से होता है मुनाफा।
जिले में ये औषधियां उगाई जा रही हैं-
जिले की धरा पर लैमन ग्रास, खस, अश्वगंधा, तुलसी, शतावर, सफेद मूसली, लहसुन आदि की फसलें पैदा की जा रही हैं। इन फसलों को किसान अन्य क्षेत्रों के बाजारों में बिक्री कर रहे हैं। विभाग किसानों को फसलों के बेहतर उत्पादन के तरीके बता रहा है।
किसान बोले, दूर हो सरकारी बेरुखी
किसान श्यामचरन कहते हैं कि किसानों को औषधि की खेती के प्रति कागजों में जागरूक किया जा रहा है, धरातल पर सरकारी योजनाओं का लाभ किसानों को नहीं मिल रहा। औषधि की खेती पर कोई अनुदान किसानों को नहीं मिला है। स्वयं के खर्चे पर खेतीबाड़ी कर रहे हैं।
हर साल औषधि की खेती के लिए अनुदान के दिशानिर्देश आते हैं, लेकिन इस बार अभी तक कोई निर्देश नहीं मिला है। जल्द ही औषधि की खेती के लिए अनुदान योजना आने की उम्मीद है। किसानों को जागरूक किया जा रहा है। -योगेश कुमार, जिला उद्यान अधिकारी
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