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गुरु पूर्णिमा : गुरु स्मरण ही नहीं, एकलव्य जैसा समर्पण और अनुशासन जगाने का संकल्प

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ध्यान योग केंद्र की फोटो सर लगा देना
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बटेश्वर। गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व महज अपने गुरुजन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने या उन्हें याद करने का औपचारिक दिन नहीं है, बल्कि यह स्वयं के भीतर एकलव्य जैसा समर्पण, अनुशासन और अटूट श्रद्धा जगाने का एक महान संकल्प दिवस है।
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल के महान धनुर्धर एकलव्य ने बिना किसी भौतिक मार्गदर्शन के केवल अपने गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति को साक्षी मानकर धनुर्विद्या में पराकाष्ठा हासिल की थी। उनका यह निष्ठा भाव इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि मन में सच्चा समर्पण और अनुशासन हो, तो कठिन-से-कठिन लक्ष्य को भी प्राप्त किया जा सकता है। आज के आधुनिक और तेजी से बदलते दौर में, जहां ज्ञान हर जगह उपलब्ध है, असल चुनौती उस ज्ञान को आत्मसात करने के लिए एकलव्य जैसी एकाग्रता और प्रतिबद्धता की है। गुरु पूर्णिमा का यह शुभ अवसर हमें याद दिलाता है कि सच्चा शिष्य वही है जो किसी भी परिस्थिति में अपने लक्ष्य के प्रति विचलित न हो और अपने भीतर के विद्यार्थी को सदैव जीवित रखे। ऐसे में इस दिन का असली उद्देश्य सिर्फ पुष्प अर्पित करना या प्रणाम करना नहीं, बल्कि अपने चरित्र में अनुशासन, अटूट श्रद्धा और निरंतर सीखने की भावना को उतारकर अपने जीवन को एक नई दिशा देना है।
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