मैनपुरी। ऐसी मान्यता है कि टेसू का आरंभ महाभारत काल से हुआ था। टेसू-झांझी की शादी के बाद ही शादियों का सीजन शुरू होता है। बदलते परिवेश और डिजिटल युग में टेसू और झांझी इतिहास की धुंधली कहानी बनकर रह गए हैं। इस विलुप्त हो रही परंपरा को देहात क्षेत्र के बच्चे जीवित किए हुए हैं।
विजय दशमी पर रावण का पुतला दहन करने के बाद टेसू-झांझी का पूजन शुरू हो जाएगा। बच्चों की टोलियां हाथों में टेसू और झांझी लेकर गली मोहल्लों में प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते देखे जा सकेंगे। लोगों को मेरा टेसू यहीं खड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा.. जैसे गीत सुनाई देंगे। बच्चे घर-घर दस्तक देकर गीत गाकर इसके बदले में अनाज व रुपये मांगते हैं। इसका प्रयोग टेसू और झांझी के विवाह में होगा। इसके बाद वैवाहिक सीजन शुरू हो जाएगा।
महाभारत काल से जुड़ी है किवदंती
बुजुर्ग रामरहीश का कहना है कि टेसू-झांझी की कहानी पर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। मान्यता है कि टेसू का आरंभ महाभारत काल से हुआ था। टेसू झांझी की शादी के बाद ही हिंदू धर्म में शादियों का सीजन शुरू होता है। बचपन में उन्हें इसका बड़ा शाैक था। रामवीर सिंह का कहना है कि आज के बदलते परिवेश व डिजिटल युग में टेसू व झांझी इतिहास की एक धुंधली सी कहानी बनकर रह गए हैं। इस विलुप्त हो रही परंपरा को देहात क्षेत्र के बच्चे जीवित किए हुए हैं। पूर्णिमा को टेसू व झांझी का धूमधाम से विवाह संपन्न होने के बाद नहर में टेसू व झांझी का विसर्जन होगा।
रावण के पुतला दहन की लकड़ी से बनता है टेसू
तीन लकड़ियों को जोड़कर बनने वाला ढांचा देखने में मनुष्य की आकृति जैसा खिलौना होता है। इसके अंदर दीपक या मोमबत्ती रखने का स्थान होता है। कहीं-कहीं टेसू रामलीला में रावण के पुतला दहन से बची लकड़ी से बनाया जाता है। केवल टेसू का सिर बनाया जाता है। इसके बाद गेरु, पीली मिट्टी, चूना और काजल से इसकी रंगाई होती है।
मनभावन होता है झांझी का प्रकाश
झांझी मिट्टी की रंग-बिरंगी एक छोटी मटकीनुमा होती है। इसमें छेद कर डिजाइन बनाए जाते हैं। थोड़ा रेत या राख भरकर इसके अंदर दीपक रखा जाता है। रात के अंधेरे में झांझी के छिद्रों से छन-छनकर बाहर आता प्रकाश मनभावन लगता है। इसे झांझी का हंसना कहा जाता है।