देश का पहला ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र (टीटीजेड) प्राधिकरण की बंदिशों में फंस गया है। नए उद्योगों के विस्तार व स्थापना पर सुप्रीम रोक है। जिस वजह से इंडियन ऑयल की मथुरा रिफाइनरी का विस्तार के लिए अनुमति नहीं मिल रही। चार साल से करीब 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक निवेश प्रस्ताव अधर में फंसा है।
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आगरा-दिल्ली हाईवे स्थित मथुरा रिफाइनरी की क्षमता वृद्धि होनी है। साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ग्रीन एनर्जी मिशन के तहत हाइड्रोजन प्लांट लगना है। हाइड्रोजन का इस्तेमाल ऊर्जा व परिवहन क्षेत्र में होगा। यह देश का पहला ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट प्रस्तावित है। यह रिफाइनरी समूचे उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में पेट्रोलियम उत्पादों की मांग को पूरा करती है।
वर्तमान में क्षमता करीब 8 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है। जिसे बढ़ाकर 10 से 11 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष किया जाएगा। साथ ही, ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट लगाकर स्वच्छ ऊर्जा का निर्माण होगा। सुप्रीम कोर्ट ने टीटीजेड में नए उद्योगों की स्थापना व विस्तार पर रोक लगा रखी है। सिर्फ प्रदूषण स्कोर 11 से 20 वाले उद्योग ही सशर्त अनुमन्य हैं।
इनके प्रभाव का अध्ययन नहीं होने से मथुरा रिफाइनरी के अलावा फिरोजाबाद कांच उद्योग, आगरा का फाउंड्री उद्योग व आगरा की भरतपुर सीमा पर स्टोन क्रशर प्रभावित हैं। प्रदूषण स्कोर के अध्ययन के लिए 10 करोड़ रुपये का रिवाल्विंग फंड की जरूरत है। यह अध्ययन नेशनल इनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) को करना है। फंड का इंतजाम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को करना है।
विस्तार की अनुमति नहीं
ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र प्राधिकरण के अध्यक्ष व मंडलायुक्त शैलेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि आईओसीएल मथुरा रिफाइनरी का विस्तार करना चाहता है। सुप्रीम कोर्ट से स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही टीटीजेड में अनुमति दी जा सकती है। रिफाइनरी ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट लगाना चाहती है।
2 लाख करोड़ का निवेश प्रभावित
टीटीजेड की बंदिश, जमीन नहीं मिलने व अन्य कारणों से जिले में करीब 2 लाख करोड़ रुपये का निवेश प्रभावित है। फरवरी 2023 में ग्लोबल इन्वेस्टर समिट के तहत आगरा में निवेश के लिए एमओयू हुए थे। हांगकांग की कंपनी लीथियम बैटरी व सेमी कंडक्टर की फैक्टरी लगाना चाहती थी। एक लाख करोड़ से अधिक निवेश का प्रस्ताव था। लेकिन, कंपनी को प्रशासन जमीन उपलब्ध नहीं करा सका।
आईएमसी प्रोजेक्ट भी अधर में
लखनऊ एक्सप्रेस-वे पर एक हजार एकड़ में इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर प्रोजेक्ट 4 साल से कागजों से बाहर नहीं निकल पा रहा। प्रस्तावित भूमि पर हरे पेड़ खड़े हुए हैं। जिन्हें काटने के लिए सुप्रीम कोर्ट से अनुमति नहीं मिल सकी। शासन की तरफ से दोबारा पैरवी की जा रही है। इस प्रोजेक्ट को उद्योगों की स्थापना के लिए गेम चेंजर माना जा रहा था।