भगवान कृष्ण के सभी प्रमुख मंदिर करोड़पति हैं। सोने और चांदी से खजाना भरा पड़ा है। साल भर में चढ़ावा ही करीब सौ करोड़ का हो जाता है। नोटबंदी के बाद जब देशभर की बैंकों में नकदी की किल्लत थी तब इन मंदिरों में आने वाले चढ़ावे ने ही बैंकों को सहारा दिया था। हर रोज गुल्लकें खुलीं और पैसा सीधे बैंकों में पहुंचा।
मथुरा को मंदिरों का शहर कहा जाता है। 500 से ज्यादा मंदिर हैं जिले में। सबसे ज्यादा मंदिर वृंदावन में हैं। यहां श्रीबांकेबिहारी मंदिर में ही साल भर में 1,26,98,000 भक्त पहुंचते हैं। यूं तो हर रोज भक्तों की भीड़ रहती है लेकिन हरियाली तीज, अक्षय तृतीय, नया साल, जन्माष्टमी, राधाष्टमी, गुरुपूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा और दीपावली पर तो कतारें लगी रहती हैं।
भगवान को चढ़ावा भी खूब चढ़ता है। बांकेबिहारी मंदिर को साल भर में करीब 15 करोड़ का दान मिल जाता है। सोने और चांदी के आभूषण भी बड़ी संख्या में भक्त भगवान को अर्पित किए जाते हैं। श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर पर भी बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं। हर रोज मेला सा लगा रहता है। जन्मस्थान मंदिर पर साल भर में चढ़ावा 11 करोड़ के करीब बैठता है।
जिक्र केवल इन्हीं मंदिरों का नहीं है बल्कि सभी प्रमुख मंदिर करोड़पति हैं। अगर देश के नामचीन मंदिरों का जिक्र किया जाएगा तो दान के मामले में मथुरा के मंदिर पहली सूची में ही अपना स्थान बना लेंगे। मथुरा तीर्थस्थल बनने के बाद इन सभी मंदिरों का और विकास होगा। इन मंदिरों की राह आसान होगी। आवागमन के संसाधन बढ़ेंगे। बरसाना, नंदगांव, गोकुल, बलदेव के लिए सीधे बसों का संचालन हो सकेगा।
ये है मंदिरों के खजाने का हिसाब
बांकेबिहारी मंदिर
श्री बांकेबिहारी मंदिर वृंदावन को सालाना15 करोड़ रूपये, श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर मथुरा को 11 करोड़ रूपये, दानघाटी मंदिर गोवर्धन को 6 करोड़ रूपये, मानसी गंगा मुखारबिंद को 5 करोड़, जतीपुरा मुखारबिंद को 3 करोड़, श्री राधारानी मंदिर बरसाना को सालाना 4 करोड़, श्री द्वारिकाधीश मंदिर को 85 लाख रू पये, इस्कॉन मंदिर वृंदावन को 3 करोड़ सालाना चढ़ावा आता है। वहीं वृंदावन के कात्यायनी मंदिर, रंगनाथ मंदिर, राधाबल्लभ मंदिर, राधादामोदर मंदिर, पागल बाबा मंदिर, वैष्णो माता मंदिर, प्रेम मंदिर, निधि वन और सेवा कुंज मंदिर के साथ गोकुल, नंदगांव, बलदेव, कोकिलावन, राधाकुंड और महावन में भी साल भर में पांच से दस लाख का चढ़ावा आ जाता है।