हौसले अगर बुलंद हों और कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो तंगहाली और मजबूरियां भी घुटने टेक देती हैं। इसे सच कर दिखाया है अजीतपुर की शशि कुमारी ने। एक दौर ऐसा था जब शशि के घर में आर्थिक तंगी के कारण खाने के निवाले बमुश्किल मिल पाते थे। पति दीपक कुमार की मजदूरी से घर चलाना मुश्किल था।
शशि ने भावुक होते हुए कहा कि तीन मासूम बच्चों के साथ दिनभर इस उम्मीद में रहती थीं कि कोई आकर उनकी मदद कर दे, बच्चों को भरपेट खाना खिला दे। पढ़ाई छूटने की कगार पर थी। इस घोर संकट के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। वर्ष 2019 में श्री साकार विश्व हरि स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। यहां से हौसला पाकर मूर्तियों का काम शुरू किया।
शशि बताती हैं कि शुरू में सबसे बड़ी समस्या यह थी कि मूर्तियां कौन खरीदेगा। बाजार की कोई समझ नहीं थी। निराश होने के बजाय उन्होंने मूर्तियों को फुटपाथ पर बेचना शुरू किया। धीरे-धीरे लोग उनसे जुड़ते गए और अब उनके पास 15 से अधिक ऐसे ग्राहक हैं, जो हर साल उनसे ही मूर्तियां खरीदते हैं। दिवाली और त्योहारों के सीजन में उनका कारोबार 1 लाख रुपये तक पहुंच जाता है।
दूसरों को कर रहीं सशक्त
शशि की यह सफलता सिर्फ उन तक सीमित नहीं है। आज वह अपने पैरों पर खड़ी होकर दूसरी मजबूर महिलाओं का सहारा बन रही हैं। उनके इस मूर्ति कारोबार में अब 10 से 15 अन्य महिलाएं भी काम कर रही हैं। ये वो महिलाएं हैं जो कभी खुद बेरोजगारी, आर्थिक तंगी और पारिवारिक परेशानियों से जूझ रही थीं। शशि उन्हें काम सिखाकर और रोजगार देकर आत्मनिर्भर बना रही हैं। अब इनके बच्चे भी उच्च शिक्षा पा रहे हैं।