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Agra News: बंदरों से मिलेगी मुक्ति, वन विभाग की अनुमति की जरूरत नहीं, आगरा में हैं करीब 30 हजार बंदर, नगर निगम पकड़वाएगा बंदर, डीएम की अध्यक्षता में बनी कमेटी करेगी निगरानी

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आगरा। अब बंदरों को पकड़ने के लिए वन विभाग से अनुमित लेने की जरूरत नहीं होगी। नगर निगम, नगर पंचायत, पालिकाएं और ग्राम पंचायतें सीधे अपने स्तर पर विशेषज्ञों की मदद से बंदरों को पकड़वा सकेंगी।
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लगातार हिंसक होते बंदरों को पकड़ने के लिए लंबे समय से स्पष्ट नीति का अभाव था। अब शासन के निर्देश पर नई कार्य योजना बनाई है। निदेशक सामाजिक वानिकी राजेश कुमार ने बताया कि नई व्यवस्था के अनुसार, बंदरों (रीसस मकाक) को वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के तहत पकड़ने की छूट दी गई है। आगरा के शहरी और ग्रामीण इलाकों में बंदरों के जो झुंड हिंसक हो चुके हैं, उन्हें पकड़कर संबंधित जनपद के ही वन क्षेत्रों में छोड़ा जाएगा।


डीएम की कमान में बनी हाईपावर कमेटी

बंदरों को पकड़ने और उनके विस्थापन तक की प्रक्रिया की निगरानी के लिए डीएम अरविंद बंगारी की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। इसमें पुलिस आयुक्त के प्रतिनिधि, नगर आयुक्त, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी और जिला पंचायत राज अधिकारी सदस्य के रूप में शामिल होंगे। यह कमेटी सुनिश्चित करेगी कि बंदरों को पकड़ने की प्रक्रिया सुरक्षित हो और उनके भोजन-पानी का प्रबंधन वन क्षेत्रों में सही ढंग से हो।
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आंकड़ों की नजर में बंदरों का खौफ
- 30,000 से अधिक बंदरों की अनुमानित संख्या।
- 15-20 मरीज औसतन मंकी बाइट के मामले।
- 500 से अधिक हादसे पिछले दो साल में बंदरों के कारण हुए।


नगर निगम के सामने त्रिशंकु चुनौती

नगर निगम के लिए यह योजना जितनी राहत भरी है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी है
1. विशेषज्ञों की कमी: बंदरों को पकड़ने वाले पेशेवर, मदारी या जानकारों की संख्या बेहद कम है।
2. बजट का संकट: बंदरों को पकड़ने और उन्हें सुरक्षित वन क्षेत्रों तक ले जाने के लिए परिवहन और मानदेय का भारी खर्च निगम को वहन करना होगा।
3. विस्थापन का विरोध: जिस वन क्षेत्र में बंदर छोड़े जाते हैं, वहां के ग्रामीण अक्सर विरोध शुरू कर देते हैं।

क्यों बेकाबू हुए बंदर

- कचरा प्रबंधन की सुस्ती: खुले में फेंके जाने वाले खाने के अवशेष बंदरों को आबादी की ओर आकर्षित करते हैं।
- प्राकृतिक आवास का खात्मा: कीठम और आसपास के जंगलों में मानवीय दखल बढ़ने से बंदर शहरों की ओर रुख कर रहे हैं।
- धार्मिक आस्था: कई लोग बंदरों को सड़कों पर फल या चने खिलाते हैं, जिससे वे इंसानों पर निर्भर हो गए हैं।

निवारण : भविष्य की राह
- कूड़ा निस्तारण : कार्ययोजना के अनुसार नगर निगम व अन्य निकायों को डस्टबिन और कूड़ा प्रबंधन को कड़ा करना होगा।

- नसबंदी केंद्र : केवल बंदरों को एक जगह से दूसरी जगह छोड़ना समाधान नहीं है। आगरा में बंदरों की नसबंदी के प्रोजेक्ट को तेज करने की जरूरत है।

- जागरूकता : वन विभाग तकनीकी रूप से जनता को बताएगा कि बंदरों के साथ किस तरह का व्यवहार करना चाहिए।

शासन के निर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाएगा। नगर निकायों के साथ समन्वय बैठाकर उन हॉटस्पॉट्स को चिन्हित किया जा रहा है, जहां बंदरों का आतंक सबसे ज्यादा है।— राजेश कुमार, प्रभागीय निदेशक, सामाजिक वानिकी प्रभाग, आगरा।
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