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Agra News: साढ़े चार साल की मासूम भूरी ने चारपाई के नीचे छिपकर बचाई थी जान

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आगरा। धरैरा में गर्भवती और दो बच्चों समेत पांच लोगों की नृशंस हत्या में परिवार में केवल साढ़े चार साल की बालिका भूरी ही जीवित बची। 42 साल पहले 3 अगस्त 1983 को जब पुलिस हत्याकांड की सूचना पर पहुुंची तो घर की छत पर सुखस्वरूप, राजवती, श्याम और कल्लो का शव पड़ा हुआ था। वृद्धा कटोरी देवी का खून से लथपथ शव बाहर चबूतरे पर पड़ा था। उसी दौरान पुलिसकर्मियों और ग्रामीणों ने बच्ची के रोने की आवाज सुनी। वह नीचे आंगन में रो रही थी, जिसे तब ताला तोड़कर बाहर निकाला गया। वह चारपाई के नीचे छिपी हुई थी। इसकी भनक हत्यारों को नहीं लग पाई थी। मृतक सुखस्वरूप की जीवित बची एक मात्र पुत्री भूरी को उसके नाना गौरीशंकर वैद्य के संरक्षण में दे दिया गया था। वह थाना इरादत नगर के ग्राम पाटम के निवासी थे। भूरी अब कहां रह रही है, इसका किसी को नहीं पता। हत्याकांड के बाद सुखस्वरूप के मकान को सील कर दिया गया था।
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65 बीघा जमीन का था लालच
मृतक सुखस्वरूप के पिता नंद सिह के भाई कुंवर पाल के छह पुत्र थे, जिनके हिस्से में 65 बीघा जमीन थी। सुखस्वरूप अपने पिता का इकलौता पुत्र था, इसलिए उसके अकेले ही हिस्से में 65 बीघा जमीन आई। इस वजह से मृतक सुखस्वरूप की संपन्नता से उसके चचेरे भाई ईर्ष्या करते थे। सुखस्वरूप का परिवार समाप्त होने के बाद उसके चचेरे भाई ही संपत्ति के कानूनी वारिस होते। पुलिस ने तब घटनास्थल से 8 खाली खोखे और एक कारतूस बरामद किया था। पुलिस के मुताबिक घर में रखा सोना चांदी और नगदी नहीं ले जाई गई। इससे स्पष्ट था कि हत्यारे केवल सभी को मारने के लिए ही आए थे।

I42 साल पहले की लाइव रिपोर्ट : बारिश से स्याह रात और हो गई भयानकI
Iसांझ के झुटपुटे में धरैरा गए हमारे संवाददाता को बातचीत के दौरान अनेक ग्रामीणों ने बताया कि लगभग 2000 की आबादी वाले गांव में ब्राह्मण, ठाकुर और बघेल बराबर हैं। सुखस्वरूप का पक्का मकान है। सुख स्वरूप जाति का ठाकुर लेकिन आचरण में विनम्र, शांतिप्रिय यहां तक कि पड़ोसियों से भी उसकी यदाकदा ही वार्ता होती थी। अपने काम से काम 65 बीघा खेत का अकेला मालिक, ट्रैक्टर और पक्का मकान, अच्छी खेती-बाड़ी। दो अगस्त की काली रात को बरसात के मौसम ने उसे और ज्यादा भयानक बना दिया था। बादल भले ही न बरसे लेकिन आकाश की काली स्याही, भयावह वातारण और सन्नाटे के लिये पर्याप्त थी। सुखस्वरूप का दोष मात्र यही या कि उसने स्वयं ही अपने हाथ-पैर मजबूत बनाकर अपनी धरती को कंचन उगलने हेतु मजबूर कर दिया था। उसके परिवारीजनों को उसका संपन्न होना अच्छा नहीं लगता था। I
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