कुछ दिन पहले ताजमहल की संगमरमरी दीवारें यमुना में प्रदूषण के कारण पनपे ‘काइरोनोमस’ कीड़ों के स्राव से हरी हो गई थीं, लेकिन अब पूरे स्मारक पर स्टोन डस्ट की लाल परत चढ़ गई है।
197 करोड़ रुपये के ताजगंज प्रोजेक्ट के तहत दर्जनों की संख्या में स्टोन कटर, ग्राइंडर चलाए जा रहे हैं, वहीं दर्जनों डीजल वाहन प्रवेश द्वारों तक पहुंच रहे हैं। एएसआई की जांच में कई सैंपलों में स्टोन डस्ट मिला है, वहीं मीनारों से कार्बन के कणों के सैंपल भी जांचे जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने दो साल पहले 2014 में ताजमहल के तीनों ओर ताजगंज के विकास के लिए प्रोजेक्ट शुरू किया। नेशनल एनवायरमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) ने पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर रिपोर्ट दीं। इसमें इस प्रोजेक्ट में पत्थरों को बाहर से काटकर लाने, केवल दो जनरेटर चलाने, मशीनों से कटाई और धूल न उड़ने देने की सिफारिशें की गई थीं। ताजगंज प्रोजेक्ट में काम कर रही फर्म पहले दिन से ही सत्ता की हनक में सभी नियमों की धज्जियां उड़ा रही है। कोबल स्टोन की जगह रेड स्टोन के 6×6 के ब्लॉक बनाने के लिए पत्थर ताजगंज में रोड पर ही काटे जा रहे हैं। लाल पत्थरों को काटने और लगाने के दौरान ग्राइंडिंग करने से जो धूल उड़ रही है, वह ताजमहल की मुख्य गुंबद और मीनाराें पर जमा हो रही है।
एएसआई ने जांच के लिए जब मीनारों और गुंबद से सैंपल एकत्र किए तो खुलासा हुआ कि इसमें रेड स्टोन डस्ट पार्टिकल सबसे ज्यादा हैं। एएसआई अधिकारी ताजमहल के मड पैक के दौरान लाल डस्ट के पाए जाने से परेशान हैं और दिल्ली मुख्यालय से इसकी विस्तृत जांच के लिए अनुमति मांगी है।
ताजगंज प्रोजेक्ट से पर्यावरण को नुकसान
ताजमहल के तीनों प्रवेश द्वारों पर ताजगंज प्रोजेक्ट के लिए सैकड़ों पेड़ तो काटे गए, लाल पत्थरों की कटाई और ग्राइंडिंग के दौरान धूल भी उड़ी। लाल पत्थर सड़क पर बिछाने के बाद रेन वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था भी खत्म हो गई। प्रोजेक्ट से पहले पर्यावरण पर अध्ययन कर चुकी नीरी टीम अब इसे दोबारा करने जल्द ही आएगी।