कुपोषण के प्रति जागरूकता की भी कमी
प्रमुख अधीक्षक डॉ. अशोक अग्रवाल ने बताया कि कोरोना महामारी के बाद से भर्ती हुए बच्चों में 55.06 फीसदी बच्चियां और 44.94 फीसदी बच्चे कुपोषित मिल रहे हैं। कोरोना महामारी से पहले अनुपात 52 और 48 फीसदी रहता था। कुपोषित बच्चों को 14 दिन तक केंद्र में रखकर उपचार के साथ पौष्टिक आहार देते हैं। परिजनों को सस्ती दर के पौषक खाद्य सामग्री के प्रति जागरूक भी करते हैं।
6 सदस्यों में आधा लीटर दूध
पृथ्वीनाथ फाटक निवासी बबीता की तीन साल की बेटी वैष्णवी कुपोषित है। इन्होंने बताया कि पति बेलदारी कर छह से आठ हजार रुपये कमाते हैं। छह सदस्यों में आधा लीटर दूध आता है। 10 साल के बेटे को दूध-फल देते हैं। बेटी चाय-रोटी खा लेती है।
बेटा होने पर दूध बढ़ाया
सिरकी मंडी निवासी पुष्पा की तीन बेटियां और एक बेटा है। बेटी में कुपोषण की पुष्टि होने पर भर्ती कराया। पति मजदूरी करते हैं। इन्होंने बताया कि घर में चाय लायक दूध ही आता था, बेटियां चाय-रोटी खा लेती थीं। बेटा होने के बाद आधा लीटर दूध मंगाने लगे हैं।
बेटियों को दूध के लिए पैसे नहीं
नगला फकीरचंद की धर्मवती की पांच बेटियां हैं, इनकी तीन साल की बच्ची कुपोषित है। इन्होंने कहा कि पति जूते की फैक्टरी में काम करते हैं। सात लोगों में आधा किलो दूध लेते हैं। ये चाय में हो जाता है, पैसे इतने नहीं हैं कि बेटियों के लिए दूध खरीद सकें।