आगरा के थाना सिकंदरा के नगला चुचैना में पकड़ी गई मल्टी विटामिन सिरप की अवैध फैक्टरी में बड़े ही नहीं बच्चों की जान से भी खिलवाड़ हो रहा था। दवा की जगह खाद्य लाइसेंस लिया गया था। पशुओं के बाड़े के आगे चल रही फैक्टरी में साफ-सफाई का इंतजाम नहीं था। गुणवत्ता जांच के लिए विशेषज्ञ नहीं थे। कंपनियों के फर्जी रैपर लगाए जा रहे थे। चिकित्सकों का कहना है कि घटिया सिरप पीने से बच्चों की किडनी, लिवर काे अधिक खतरा था।
यहां मारा था छापा
सिकंदरा पुलिस ने बुधवार को औद्योगिक क्षेत्र स्थित नगला चुचैना में अवैध दवा फैक्टरी पर छापा मारा था। फैक्टरी एत्मादपुर निवासी मनीष गुप्ता की थी। वह पश्चिमपुरी में किराये पर परिवार सहित रहता है। फैक्टरी में 30 पेटी मल्टी विटामिन और फूड सप्लीमेंट के सिरप मिले थे। चार पेटी में एनर्जी और भूख बढ़ाने के सिरप थे। बोरियों में चीनी-बूरा रखा था। एक्सपायर्ड दवाएं और नामी कंपनी के फर्जी रैपर थे। सिरप तैयार करने का सामान और उपकरण भी थे।
ये भी पढ़ें - UP: लापता पत्नी दो साल बाद मिली, गोद में था एक साल का मासूम बच्चा; सामने आई हैरान कर देने वाली हकीकत
घटिया सिरप से लिवर व किडनी को खतरा
नगला चुचाना में बनने वाले घटिया सिरप पीने से बच्चों की किडनी, लिवर काे अधिक खतरा था। चिकित्सक मानते हैं कि लंबे समय तक एनर्जी और भूख बढ़ाने के ऐसे सिरप पीने से बच्चे मधुमेह, हृदय रोग, तंत्रिका तंत्र रोग और कोलेस्ट्रॉल जैसी बीमारियां 15 साल पहले ही दस्तक दे देंगी।
ये भी पढ़ें - महंगी पड़ी प्रेमिका से शादी: दुल्हन बनकर आई घर, पत्नी बनते ही दे दिया ऐसा गम; प्रेमी बोला- नहीं हो रहा यकीन
इसलिए था खतरा
इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अध्यक्ष डॉ. अरुण जैन ने बताया कि बच्चों को प्रोटीन, विटामिन, हीमोग्लोबिन, भूख बढ़ाने के सिरप सख्त मानकों पर बनते हैं। इनमें घटिया तत्व और चीनी-बूरा, रिफाइंड, पाउडर जैसे तत्व से बने सिरप बच्चे पीएंगे तो किडनी, लिवर खराब होने का खतरा होता है। पेट में अल्सर, अपच, पेट रोग सबसे पहले प्रभावित होते हैं। शारीरिक विकास भी प्रभावित होगा। एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के डॉ. प्रभात अग्रवाल ने बताया कि सिरप में शुगर और अन्य तत्वों को मनमाने अंदाज से मिलाया जाता है। कई बार परिजन बच्चों को लंबे समय तक एनर्जी और भूख बढ़ाने के सिरप पिलाते हैं। इससे शरीर में शुगर व नमक की अत्यधिक मात्रा पहुंचती है। इससे बीमारियां 25-30 की उम्र में ही होने का खतरा अधिक होता है।