आगरा की ग्रामीण महिलाएं गोबर और तुलसी के बीज से इको फ्रेंडली राखियां तैयार कर रही हैं, जिनकी मांग आगरा के साथ बिहार तक पहुंच गई है। रेशम, मोती, कुंदन और गोटे से बनी स्वदेशी राखियां भी बाजार में चाइनीज और प्लास्टिक राखियों को टक्कर दे रही हैं।
ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं। उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (यूपीएसआरएलएम) के तहत जनपद की 30 से अधिक महिलाएं रक्षाबंधन के लिए आकर्षक और स्वदेशी राखियां तैयार कर रही हैं। इन राखियों की बढ़ती मांग के कारण जिले के साथ-साथ बिहार से भी बड़े पैमाने पर ऑर्डर मिल रहे हैं।
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बिचपुरी के लखनपुर गांव की राधारानी स्वयं सहायता समूह की महिलाएं गाय के गोबर से खास इको-फ्रेंडली राखियां बना रही हैं। इन राखियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें तुलसी के बीज मिलाए गए हैं। पर्व के बाद जब इन्हें मिट्टी या गमले में विसर्जित किया जाएगा, तो इनसे तुलसी का पौधा पनपेगा। यह नवाचार पर्यावरण संरक्षण का बेहतरीन उदाहरण पेश कर रहा है।
खेरागढ़ के बजरंग बली और जैतपुर कलां के स्वयं सहायता समूह की महिलाएं रेशम के धागों, रंग-बिरंगे मोतियों, कुंदन और गोटे से पारंपरिक राखियां बना रही हैं। ये स्वदेशी उत्पाद बाजार में प्लास्टिक और चाइनीज राखियों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।
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राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन उपायुक्त प्रेम चंद ने बताया कि ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाना प्रशासन की प्राथमिकता है। इस बार महिलाओं ने 10 से 50 रुपये तक की कीमत वाली लगभग 20 से 25 हजार राखियां बनाई हैं। इनकी बिक्री के लिए विकास भवन और प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर स्टॉल लगाए जा रहे हैं।