लोग धनतेरस से लेकर दिवाली तक संपन्नता के लिए कछुओं को घर में ले आते हैं, लेकिन धनतेरस पर कछुओं को घर में रखने की भूल न करें। यह आपको सलाखों के पीछे पहुंचा सकता है। वास्तु के लिहाज से भी इसे शुभ नहीं माना जाता है।
अंधविश्वासी लोग धनतेरस से लेकर दिवाली तक संपन्नता के लिए तंत्र-मंत्र में नाखून और कवच इस्तेमाल करने के लिए सुंदरी प्रजाति के कछुओं की तस्करी करते हैं, लेकिन यह गैरकानूनी है। जीवित कछुओं को घर में पालना या रखना अवैध है। हां, अगर रखना भी है तो आप धनतेरस पर धातु या चांदी का कछुआ घर में ला सकते हैं, जो समृद्धि और दीर्घायु का प्रतीक है और इसे घर में रखना शुभ है।
बाह के रेंजर कुलदीप सहाय पंकज ने बताया कि जन सामान्य को जागरूक किया गया है कि कछुए चंबल नदी को साफ करते हैं। अंधविश्वास के चक्कर में जीवित कछुओं की तस्करी से बचें। उन्होंने बताया कि तटवर्ती ग्रामीणों को 60 वन समितियों के माध्यम से संदिग्ध लोगों के दिखने पर वन विभाग को सूचना देने के लिए जागरूक किया गया है।
मोटरबोट के जरिये चंबल नदी में नियमित रूप से पेट्रोलिंग की जा रही है। कछुओं के संरक्षण पर 15 साल से काम कर रहे टीएसए (टर्टल सर्वाइवल एलायंस) के प्रोजेक्ट ऑफिसर पवन पारीक ने बताया कि सुंदरी प्रजाति के कछुआ का नाम फ्लैप शेल कछुआ है। इसका वैज्ञानिक नाम लिस्सेमिस पंक्टाटा है। सड़े-गले और अवशिष्ट पत्तियां, कीड़े-मकोड़े और जलीय पौधे इनका भोजन होते हैं। ये स्वच्छता में मददगार होते हैं। हमले का खतरा बढ़ने पर खुद को कवच में छिपाकर रक्षा करता है। कवच, नाखून और मांस के लिए इनकी तस्करी का खतरा रहता है।
बता दें कि चंबल नदी में चंबल नदी में कछुओं की 8 दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण हो रहा है। इनमें कठोर कवच वाली ढोर, साल, पचेड़ा, काली ढोर और नरम कवच वाली स्योत्तर, कटहवा, सुंदरी, मोरपंखी प्रजातियां शामिल हैं। कठोर कवच वाले कछुए शाकाहारी होती हैं। जबकि नरम व मुलायम कवच वाले कछुए मुख्यत: मांसाहारी होते हैं। उनका बाहरी कवच मांसपेशियों का बना होता है। चंबल के मरे और सड़े गले जीव-जंतुओं को खाकर पानी को स्वच्छ रखते हैं।