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प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डीके जोशी नहीं रहे

Tue, 11 Oct 2016 12:18 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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डीके जोशी के निधन से गहरे शोक में पर्यावरण प्रेमी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एवं सुप्रीम कोर्ट मानीटरिंग कमेटी के सदस्य डीके जोशी का लंबी बीमारी के बाद सोमवार को दिल्ली में निधन हो गया। वह 78 वर्ष के थे। 22 दिन से दिल्ली के आनंद विहार स्थित एक हॉस्पिटल में भर्ती थे। उन्हें जीवन रक्षा प्रणाली (वेंटिलेटर) पर रखा गया था। सोमवार रात उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना से पर्यावरण प्रेमी गहरे शोक में डूब गए। आगरा के शाहगंज की फ्रेंड्स कालोनी निवासी जोशी लंबे समय से पर्यावरण की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। उनके पार्थिव शरीर का दाह संस्कार मंगलवार दोपहर एक बजे ताजगंज स्थित मोक्षधाम श्मशान घाट पर किया जाएगा। उनकी कोशिशों से आगरा नगर निगम के 1092 सफाई कर्मचारियों और 53 सुपरवाइजरों को स्थायी नौकरी मिली थी। इसके अतिरिक्त उनकी रिट पर ही वर्ष 2000 में सुप्रीम कोर्ट ने झोलाछापों पर प्रतिबंध लगाया था।

अब कौन लडे़गा डूब क्षेत्र बचाने की लड़ाई
डीके जोशी नहीं रहे। ताजनगरी के लिए यह दुखद समाचार सदमे की तरह है। 78 वर्ष की उम्र में बीमारी से जूझने के बावजूद यह शख्स पर्यावरण की रक्षा के लिए सिस्टम से लड़ रहा था। उनके निधन की खबर आते ही हर शहरवासी की जुबां पर पहला सवाल यही आया, डूब क्षेत्र की लड़ाई कौन लड़ेगा। सूर सरोवर पक्षी विहार को बचाने के लिए भी उन्होंने लंबा संघर्ष किया। उनकी जगह यह बीड़ा अब कौन उठाएगा। शहर ने उम्मीद की एक मशाल को खो दिया है।
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डीके जोशी संघर्ष का दूसरा नाम थे। उनका रण भीषण था लेकिन कानून के दायरे में। वह सिस्टम से लड़ रहे थे, लेकिन कानून को हथियार बनाकर। उन्होंने आगरा के सीवेज, ड्रेनेज, पेयजल सुविधा के लिए अदालत में लंबी लड़ाई लड़ी। सुप्रीम कोर्ट, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट में तमाम जनहित याचिकाएं दायर कीं। केस लड़े। एक ओर पूरा सरकारी अमला, तो दूसरी तरफ अकेले जोशी। कभी डरे नहीं, तमाम बाधाएं आईं, पर कभी रुके नहीं।
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उनका जन्म 1938 में गुजरात ( पाकिस्तान) में हुआ था। पिता अयोध्या लाल जोशी और मां प्रकाशवती थे। विभाजन के बाद परिवार अजमेर में आकर बसा। यहीं पर डीके जोशी की पढ़ाई हुई। उन्होंने स्नातक किया। इसके बाद नौकरी की, अखबार से जुड़े, कारोबार किया, राजनीति में भी रहे। कांग्रेस में प्रदेश महामंत्री पद तक पहुंचे।

संघर्ष की दास्तां
- शहर के पेयजल और ड्रेनेज के लिए जनहित याचिका दायर की। प्रशासन को हरकत में आना पड़ा।
- शहर के तालाबों और सरकारी जमीन को कब्जों से मुक्त कराने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी।
- उनकी जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने झोलाछापों की प्रैक्टिस पर रोक लगाई।
- उनकी कोशिशों से नगर निगम के 1092 सफाईकर्मियों और 53 सुपरवाइजरों को स्थाई नौकरी मिली।
- यमुना को मूल स्वरूप में लाने के लिए उनका संघर्ष आखिरी दम तक जारी रहा।
- सूर सरोवर पक्षी विहार की पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए भी लंबा संघर्ष किया।
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