कासगंज। शादी, जन्मदिन सहित अन्य मांगलिक कार्यक्रमों के दौरान मस्ती, डांस आदि के लिए डीजे लगाया जाता है। डीजे के फ्लोर पर दिल और दिमाग की नसों को हिला देने वाले म्यूजिक के शोर से लोग अंजान रहते हैं। यह शोर दिल और दिमाग की सेहत के लिए हानिकारक है। लोगों की श्रवण क्षमता भी प्रभावित हो रही है। साथ ही डांस करते समय मौत के मामले भी आए दिन सामने आते है। तीन दिन पूर्व एटा में डीजे फ्लोर पर डांस करते समय हार्ट अटैक से किशोर की मौत हो गई। इससे पहले सहावर गेट इलाके में एक युवक की मौत डीजे फ्लोर पर हो चुकी है। डीजे पर ध्वनि की सीमा निर्धारित है। इसे अधिकतम 45 डेसिबल तक बजाया जा सकता है, लेकिन डीजे संचालक सौ से दो सौ डेसिबल तक डीजे चलाते हैं और यह ध्वनि व्यक्ति के सहन शक्ति से बाहर हो जाती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक कान की अधिकतम क्षमता 60 डेसिबल तक आवाज सहन करने की होती है। यह निरंतर क्रम में नहीं होनी चाहिए। लंबे समय तक अधिक ध्वनि से कान में दर्द, बहरापन, दिमाग में हलचल, सीने में दर्द, पल्स का बढ़ना, शरीर में कंपन होना जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे में हृदयाघात व लकवा की स्थिति भी बन सकती है।
साउंड और समय का मानक है निर्धारित :
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार ध्वनि व समय संबंधी तय हैं लेकिन डीजे संचालक इस पर ध्यान देते। एडवोकेट एवं पूर्व सदस्य उपभोक्ता न्यायालय अजय तिवारी बताते हैं कि ध्वनि प्रदूषण करने पर सजा का प्रावधान है। लोग निर्धारित सीमा से अधिक ध्वनि वाले म्युजिक सिस्टम न बजाएं। रात्रि दस बजे के बाद डीजे साउंड सिस्टम बंद होने चाहिए लेकिन इन नियमों का पालन नहीं होता।