पुलिस ने बताया कि 18 अक्तूबर की रात नौ बजे ललित ने धर्मेंद्र के नींद की हालत में ही चौड़ी वाली टेप से हाथ और पैर बांध दिए। अरुण मुंह पर टेप लगा रहा था। उसने नाक पर भी टेप लगा दी। इससे धर्मेंद्र की सांस बंद हो गई। दम घुटने से उसकी जान चली गई। इसका पता चलते ही शव ठिकाने लगाने की साजिश पर काम शुरू हुआ।
तीन दिन रजाई में बंद रखा शव, चौथे दिन से फूंका
शव पर एक रजाई लपेटी और घर में रखी धूपबत्ती हर कोने में जला दी गई। ललित 700 रुपये की अगरबत्ती ले आया। कमरे में रूम फ्रेशनर का स्प्रे करता रहा। तीन दिन (18, 19 और 20 अक्तूबर) इसी में बीत गए कि शव का क्या किया जाए? चौथे दिन 21 अक्तूबर को साजिश बनी, इसे जला दिया जाए। इस पर ललित 10 लीटर पेट्रोल खरीदकर लाया। इससे शव को फूंका गया।
पहले दिन पैर, दूसरे दिन धड़ और तीसरे दिन सिर फूंका
पहले दिन 21 अक्तूबर को धर्मेंद्र के शव के निचला हिस्सा फूंका गया। पैर जलने के बाद आग धड़ तक पहुंचते ही बुझा दी गई। ऐसा इसलिए किया, ताकि बदबू न फैले। एक साथ शव जलाते तो आग, धुएं या बदबू से पड़ोसियों को पता चल सकता था। दूसरे दिन 22 को धड़ का हिस्सा फूंका और फिर आग बुझा दी। तीसरे दिन 23 को शेष हिस्सा फूंक दिया।
छठे दिन नाले में फेंक दी हड्डियां
शव जल चुका था। सिर्फ हड्डियां बची थीं। छठे दिन ही यानी 23 अक्तूबर की देर रात हड्डियों को एक चादर में रखा। पहले शालिनी के घर के बाहर जाकर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा। इसकेबाद ललित और अरुण स्कूटी से हड्डियों को बिचपुरी नाले में फेंक आए।
बीएससी पास हैं आरोपी
ललित मूल रूप से जैतपुर का रहने वाला है। काफी समय अछनेरा में रहा है। कुछ समय से ग्रीन-पिंक सिटी, शाहगंज में रह रहा है। वह बीएससी (बायो) किए हुए है। फार्मा कंपनी में एरिया सेल्स मैनेजर रहा है। उसका चचेरा भाई अरुण उर्फ दीपक पुत्र राकेश कुमार, रुनकता का रहने वाला है। वह बीएससी (मैथमेटिक्स) पास है। ललित के घर में वह और मां शालिनी ही हैं।