ताजमहल का शहर आगरा 'पेठा नगरी' के नाम से भी जाना जाता है। वजह है यहां का पेठा। जिसने भी इस लजीज मिठाई को एक बार खाया वो इसके स्वाद का दीवाना हो गया। लेकिन अब पेठा उद्योग पर ही संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
हवा में घुली चाशनी की महक, सड़क के दोनों ओर सजीं दुकानें, कारखानों में काम करते कामगार और नालियों में चूने की सफेदी लिए बहता तेज रफ्तार पानी इस बात का अहसास कराते हैं कि आप नूरी दरवाजे पहुंच गए हैं। यह वही जगह है जहां से पेठा देश के कोने-कोने में पहुंचा। ताजमहल के बाद आगरा की दूसरी सबसे बड़ी पहचान बना लेकिन आज पेठा उद्योग संकट में दौर में है और अपने ताज को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।
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एक वक्त था जब नूरी दरवाजे पर 500 से ज्यादा पेठे की इकाइयां चल रही थीं, अब 50 से भी कम बची हैं। वजह है पलायन। पेठा फैक्टरी संचालक अजय कुमार गर्ग कहते हैं कि उच्चतम न्यायालय के आदेश पर प्रशासन ने कोयले को प्रतिबंधित तो कर दिया लेकिन अदालत के उस फैसले पर अमल नहीं किया, जिसमें पेठा फैक्टरी संचालकों को सब्सिडी पर गैस उपलब्ध कराने की बात कही गई थी।
अजय कहते हैं, प्रशासन ने नूरी दरवाजे से पेठा फैक्टरियों को कालिंदी विहार में शिफ्ट करने की योजना बनाई, प्लॉट काट दिए लेकिन सुविधाएं नहीं दीं। नतीजा यह हुआ कि योजना फेल हो गई। वहां कोई नहीं गया। वहां मेरा भी प्लॉट था, जिसे मैंने बेच दिया। अब पेठा फैक्टरियां आगरा से बाहर जा रही हैं। कई तो दिल्ली, हरियाणा व दूसरे राज्यों में शिफ्ट हो गईं हैं। कुछ आगरा के बाहर गांवों व अन्य जगहों पर चली गईं जहां कोयले या लकड़ी पर पेठे तैयार किए जा रहे हैं। मतलब आगरा का पेठा अब आगरा से बाहर भी बनने लगा है।
शहीद भगत सिंह पेठा एसोसिएशन के अध्यक्ष व प्राचीन पेठा के मालिक राजेश अग्रवाल कहते हैं कि प्रशासन ने पेठा उद्योग को लेकर फैसले खुद ले लिए, उद्यमियों की बात नहीं सुनी। कालिंदी विहार का पानी खारा है। खारे पानी में पेठा नहीं बन सकता। हमने सिकंदरा सब्जी मंडी के पास पेठा नगरी बसाने की बात कही थी, वहां कीठम से मीठे पानी की आपूर्ति और सब्जी मंडी के पास होने से पेठे के फल की उपलब्धता आसान हो जाती लेकिन प्रशासन ने मनमानी कर कालिंदी विहार में पेठा नगरी की जगह तय कर दी। वहां तब जंगल था। कोई सुविधा नहीं थी, अब भी नहीं है, इसलिए वहां कोई गया नहीं।
सब्सिडी पर गैस मिले तो पेठा निर्माण को मिले ऑक्सीजन
शहीद भगत सिंह पेठा एसोसिएशन के महामंत्री सुनील कुमार सिंघल ने कहा कि सब्सिडी पर गैस नहीं मिलने से पेठा उद्योग दम तोड़ रहा है। पहले कोयले से पेठा बनाने पर लागत कम आती थी लेकिन गैस के इस्तेमाल से लागत बढ़ गई है। इससे दाम बढ़े हैं और बिक्री घटी है। व्यापारियों को जब तक गैस पर सब्सिडी नहीं मिलेगी, उद्योग को ऑक्सीजन नहीं मिलेगा।
पेठा नगरी में भैंसों का तबेला
कालिंदी विहार में राधिका पेठा स्टोर के नाम से केवल एक पेठा फैक्टरी चल रही है जबकि प्रशासन ने यहां पूरी पेठा नगरी बसाने की योजना बनाई थी। भूमि भी आवंटित की थी। यहां चल रहे एकमात्र पेठा फैक्टरी के संचालक कमल गुप्ता ने कहा कि प्रशासन ने यहां कोई सुविधा उपलब्ध नहीं कराई। सबसे बड़ी समस्या खारे पानी की है। सीवर लाइन भी नहीं है। सड़कें बदहाल हैं। पाइपलाइन बिछा दी गई है लेकिन गैस नहीं है। पेठा नगरी में अब भैंसों के तबेले, रिहायशी मकान व दूसरे उद्योग-धंधे चल रहे हैं।