आंख में चोट लगने के बाद इलाज कराने में देरी लोगों को भारी पड़ रही है। आंखों की रोशनी कम हो रही है। मरीज जितनी देर करता जाता है, समस्या उतनी अधिक बढ़ जाती है। एसएन मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में इस पर शोध किया गया है।
नेत्र रोग की डॉ. स्निग्धा सेन की देखरेख और विभागाध्यक्ष डॉ. हिमांशु यादव व डॉ. पिंकी वर्मा के मार्गदर्शन में डॉ. मुकेश प्रकाश ने आंखों की विकलांगता का प्रमाणपत्र बनवाने आने वाले 40 वर्ष से कम आयु के मरीजों पर शोध किया है। डॉ. मुकेश प्रकाश ने बताया कि उन्होंने दिसंबर 2020 से जून 2022 तक 172 लोगों पर काम किया। अधिकतर लोगों में ट्रॉमा (चोट लगने) की वजह से आंखों की रोशनी कम हुई।
इसमें भी खेती का काम करने वाले मजदूरों की संख्या अधिक रही। काम करने के दौरान उनकी आंख में चोट आई। डॉक्टरों के पास समय से पहुंचे नहीं या मनमाना उपचार कर लिया। इससे उनकी समस्या बढ़ गई। डॉ. मुकेश प्रकाश का कहना है कि लोग समय से इलाज कराने के लिए पहुंचते तो आंखों की रोशनी बचाई जा सकती थी।
30 से 100 फीसदी तक चली गई रोशनी
जिन 172 लोगों पर शोध कार्य किया गया, उसमें से 64.53 फीसदी पुरुष और 35.47 फीसदी महिलाएं थीं। 31 से 40 वर्ष की उम्र वालों की संख्या सर्वाधिक 41.27 फीसदी रही। 36.62 फीसदी लोगों में 75 फीसदी रोशनी चली गई थी। 24.48 फीसदी लोगों में 40 फीसदी रोशनी और 20.9 फीसदी लोगों में 30 फीसदी आंखों की रोशनी कम हो गई थी। जबकि 18 फीसदी मरीज ऐसे थे, जिनमें 100 फीसदी रोशनी चली गई थी। मरीजों में जागरुकता की कमी की वजह से ऐसा हुआ। यदि ये जागरूक होते और समय से इलाज कराते तो अधिकतर की आंख की रोशनी कम होने से बचाया जा सकता था।