जिस प्रशासन ने 2005 में कुलकुलबाजी को दोबारा शुरू कराया था, उसी की वजह से ये पुरानी परंपरा दम तोड़ गई। प्रशासन के उपेक्षात्मक रवैये के कारण उस्तादों ने 30 दिसंबर तक के सभी मुकाबले रद कर दिए हैं। आगे भी कोई मुकाबला न करने का निर्णय लिया है। कुलकुलबाजी अब यादों में सिमट कर रह जाएगी।
मुगलकालीन परंपरा को सहेजने के लिए किसी भी स्तर पर कोई कोशिश नहीं की गई। उस्ताद अपने स्तर से इसे बचाने में लगे हुए थे। हर साल अलग-अलग मैदानों में कुलकुलबाजी का आयोजन होता था। इस साल भी 25-26 दिसंबर को कुबेरपुर और यमुना एक्सप्रेस वे के पास कुलकुलबाजी हुई। 27 दिसंबर को सौ फुटा रोड पर मुकाबला होना था, लेकिन प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी थी। इसलिए पुलिस प्रशासन ने मुकाबला बंद करा दिया गया।
कुलकुलबाजी के उस्ताद दिनेश का कहना है कि महीने भर पहले से प्रशासन के चक्कर लगाए। एसपी सिटी के यहां से अनुमति मिल गई, लेकिन एडीएम सिटी के आफिस ने नहीं दी। हमारे पास और कोई स्थान नहीं था इसलिए सौ फुटा रोड गए। हर साल प्रशासन का यही रवैया रहता है। इसलिए हम लोगों ने फैसला किया है कि अब कुलकुलबाजी खत्म कर दी जाए।
कुलकुलबाजी 31 साल पहले बंद हो गई थी। सन् 2005 में जिलाधिकारी ने शासन के आदेश पर ताजमहल की सालगिरह के उपलक्ष्य में महताब बाग में कुलकुलबाजी कराई थी। उसके बाद यह परंपरा दोबारा शुरू हो गई पर प्रशासन ने कोई सहयोग नहीं दिया।
कुलकुलबाजी की परंपरा मुगल काल से चली आ रही है। जनकवि नजीर अकबराबादी ने भी अपनी कविताओं में आगरा की कुलकुलबाजी का वर्णन किया है।
कुलकुलबाजी के दौरान कई कबूतर घायल हो जाते हैं। इसलिए पूर्व के आदेशों को देखते हुए ही कुलकुलबाजी को फिर से बंद करने का निर्णय लिया गया है।
- राजेश कुमार श्रीवास्तव, एडीएम सिटी