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इशारे बन गए शब्द: न्याय की ये कहानी है उस मासूम की, जो बोल नहीं सकती; अदालत ने सुनाई दरिंदे को ये सजा

Tue, 13 Oct 2026 10:25 AM IST
Dhirendra Singh अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा

सार

आगरा के ताजगंज क्षेत्र में मूक और मानसिक रूप से कमजोर 18 वर्षीय युवती से दुष्कर्म के मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने दोषी को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने उस पर 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
 
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court new - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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 ताजगंज क्षेत्र में पड़ोसी ने इन्सानियत को शर्मसार करते हुए एक मानसिक रूप से कमजोर और बोलने में अक्षम युवती के साथ दरिंदगी की। शायद यह सोचकर कि वह अपनी पीड़ा बयां नहीं कर सकेगी और बच जाएगा लेकिन न्याय की भाषा शब्दों की मोहताज नहीं होती।
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दिव्यांग बेटी जब अपनी आपबीती बोलकर नहीं बता सकी तो उसके आंसुओं और चीखते मौन ने अदालत को झकझोर दिया। उस बेजुबान के इशारों और उसकी बहन के लिखकर दिए गए बयान को कोर्ट ने पुख्ता सबूत माना और दुष्कर्म के आरोपी को दोषी करार देते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

 

थाना ताजगंज में प्राथमिकी दर्ज कराते हुए युवती के पिता ने आरोप लगाया था कि 20 मई, 2024 को दोपहर में वह घर के बाहर सो रहे थे। पत्नी मायके और अन्य परिजन काम से बाहर गए थे। घर में उनकी 18 साल की बेटी थी, जो मानसिक रूप से कमजोर और मूक है। पड़ोस में दुकान करने वाला गोविंदा उर्फ हरगोविंद उनके घर आया और बेटी से दुष्कर्म किया। जागने पर जब अंदर गए तो आरोपी उन्हें देखकर भाग गया। बेटी रोते हुए उनके पास आई। इसके बाद छोटी बेटी ने उससे पूछा तो इशारों में दुष्कर्म की जानकारी दी।

 

विवेचक ने 12 जून, 2024 को विवेचना कर अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। अभियोजन पक्ष की तरफ से पीड़िता, उसकी छाेटी बहन सहित पांच गवाह अदालत में पेश किए गए। बचाव पक्ष ने भी चार गवाह पेश हुए। उन्होंने मारपीट होने की बात कही। पीड़िता ने इशारों में दुष्कर्म की बात कही और छोटी बहन ने उसे बयान के रूप में लिखा। फास्ट ट्रैक कोर्ट के जज नीरज श्रीवास्तव ने सबूतों और गवाहों के आधार पर दोषी को सजा सुनाने के साथ 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।

 

आरोपी के अधिवक्ता के तर्क नहीं आए काम
आरोपी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विवेचक ने विवेचना के दौरान घटना स्थल के आसपास के लोगों को गवाह नहीं बनाया। डॉक्टर ने दुष्कर्म होने के बारे में स्पष्ट जवाब नहीं दिया। घटना की प्राथमिकी भी दो दिन बाद दर्ज कराई गई। कोई स्वतंत्र गवाह भी नहीं पेश किया गया लेकिन ये तर्क अदालत में काम नहीं आए।


 
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कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने कहा कि विवेचना की कमी का लाभ आरोपी को नहीं दिया जा सकता। दो दिन बाद प्राथमिकी दर्ज कराना देरी की श्रेणी में नहीं आता है। स्वतंत्र गवाह पर अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जिसकी बेटी मानसिक रूप से कमजोर हो वह किसी युवक पर ऐसा आरोप जो समाज के लिए कलंकित है, अपनी इज्जत दांव पर लगाकर नहीं लगाएगा।
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