मैनपुरी। कोर्ट के आदेश पर रिपोर्ट दर्ज करके विवेचना में पुलिस द्वारा मनमानी करने पर अदालतों का अब रुख बदल गया है। पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करके विवेचना करने का आदेश देने की बजाए अदालतें अब शिकायतों को मुकदमा के रूप में दर्ज करके सुनवाई करने लगी हैं।
थाने में पीड़ित की रिपोर्ट नहीं लिखे जाने पर पीड़ित कोर्ट की शरण लेता है। सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत पीड़ित की शिकायत में दिए गए तथ्यों और साक्ष्यों से संतुष्ट होकर मजिस्ट्रेट संबंधित थानाध्यक्ष को रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दिया जाता है। पुलिस रिपोर्ट दर्ज करके विवेचना में मनमानी करती है। अपराध का संक्षेपीकरण करके पीड़ित द्वारा बताए गए घटनाक्रम को कम करके पुलिस अपनी जांच रिपोर्ट कोर्ट में भेज देती है। पीड़ित पुलिस की जांच रिपोर्ट को चुनौती भी देते हैं। पुलिस की मनमानी को रोकने के लिए अब अदालतों ने धारा 156 (3) के तहत की गई शिकायतों को मुकदमा के रूप में दर्ज करके सुनवाई करना शुरू कर दिया है। इससे पीड़ित के धन और समय की बरबादी रुक जाती है।
467 में से 343 में सीधे हुई सुनवाई
वर्ष 2019 में धारा 156 (3) के तहत 467 लोगों ने शिकायतें दर्ज कराईं। अदालतों से 343 मामलों को सीधे मुकदमे के रूप में दर्ज करके सुनवाई की गई। 124 मामलों में पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करने के निर्देश दिए गए। इनमें से 43 मामलों में पुलिस की जांच रिपोर्ट को चुनौती दी गई।
केस-एक
करहल रोड निवासी शकुंतला देवी ने सीजेएम कोर्ट में फरवरी 2019 में नामित लोगों केे खिलाफ घर में घुसकर मारपीट करने की शिकायत की। सीजेएम कोर्ट में पुलिस को जांच का आदेश देने की बजाए कोर्ट में शिकायत को मुकदमा के रूप में दर्ज करके मुकदमे की सुनवाई की गई।
केस-दो
बेवर के सदर बाजार निवासी रामआसरे ने मई 2019 में जमीन पर कब्जा करके निर्माण करने की शिकायत नामित लोगों के खिलाफ सीजेएम कोर्ट में की। सीजेएम ने शिकायत पर कार्रवाई करते हुए मुकदमा दर्ज करके सुनवाई की। आरोपियों को इस मामले में जमानत तक करानी पड़ी।
कोर्ट के आदेश पर दर्ज रिपोर्ट में मनमानी रोकने के लिए अदालत में सीधे सुनवाई की प्रक्रिया लाभकारी साबित हो रही है। इस प्रक्रिया से पीड़ितों को लाभ मिल रहा है।
शरवीर सिंह, पूर्व शासकीय अधिवक्ता
अदालत में सीधे सुनवाई होने से पीड़ित के धन और समय की बर्बादी रुक जाती है। उसको थाने केे चक्कर नहीं लगाने पड़ते हैं। पीड़ित को दो स्थानों पर अपना पक्ष नहीं रखना पड़ता है।
संजीत गौड़, पूर्व अध्यक्ष, बार एसोसिएशन