आगरा के सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज (एसएन मेडिकल कॉलेज) की पैथोलॉजी में की गई जांच में छह लोग ऐसे मिले, जिनमें एंटीबॉडीज तो बनी लेकिन 14 दिन पहले ही इनकी कोरोना जांच रिपोर्ट निगेटिव थी। अब सवाल यह है कि जब वायरस शरीर में आया नहीं तो एंटीबॉडीज कैसे बन गईं और इन्हें संक्रमित होने का पता क्यों नहीं चला? चिकित्सकों का कहना है कि हो सकता है कि जांच के समय वायरस का लोड कम हो और वह प्रभावी न हो। जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है, उनमें ऐसा देखने को मिल रहा है।
एसएन मेडिकल कॉलेज की पैथोलॉजी लैब की प्रभारी डॉ. नीतू चौहान ने बताया कि सात महीने में 252 लोगों ने एंटीबॉडीज की जांच कराई है। कई ऐसे रहे जो खुद संक्रमित नहीं मिले थे लेकिन इनके परिजन या सहकर्मी में वायरस मिला था। इस कारण इन्होंने जांच कराई। इनमें से छह लोग ऐसे मिले, जिनकी रिपोर्ट 14 दिन पहले निगेटिव थी। अब इन्होंने एंटीबॉडीज की जांच कराई तो सभी में ये पाई गईं। इतना ही नहीं, अन्य के मुकाबले इन छह में एंटीबॉडीज सबसे बेहतर पाई गई।
केस-1
बुखार आने पर कराई थी जांच
शाहगंज निवासी 43 वर्षीय उद्यमी का पूरा परिवार संक्रमित हो गया था। उद्यमी को एक दिन हल्का बुखार आया, ऐसे में उन्हें संक्रमण होने की आशंका थी, 14 दिन बाद परिवार और खुद की एंटीबॉडीज की एसएन मेडिकल कॉलेज में जांच कराई तो ये शरीर में मिलीं।
केस 1
सहकर्मियों के संक्रमित होने पर दिया था नमूना
एसएन पैथोलॉजी को 28 साल के कर्मचारी की जांच में एंटीबॉडीज मिली हैं। उसने बताया कि स्टाफ में चार साथी संक्रमित होने के बाद जांच कराई थी, लेकिन तब रिपोर्ट निगेटिव आई थी। पैथोलॉजी प्रभारी ने 14 दिन बाद सभी कर्मचारियों की एंटीबॉडीज की जांच की। उसमें एंटीबॉडीज मिली हैं।
चिकित्सक की रिपोर्ट आई थी निगेटिव
एसएन मेडिकल कॉलेज की 34 साल की चिकित्सक ने संक्रमित होने की आशंका पर खुद और परिजनों जांच कराई। वह निगेटिव जबकि परिजन पॉजिटिव मिले। इसके बाद उन्हें खराश हुई थी, इस कारण 14 दिन अपनी और परिजनों की एंटीबॉडीज की जांच कराई। सभी में एंटीबॉडीज मिली।
40 लोग ठीक हो गए.. संक्रमित होने का पता न चला
एसएन मेडिकल की पैथोलॉजी लैब में हर मंगलवार और शुक्रवार को एंटीबॉडी की जांच हो रही है। अब तक 252 लोगों में से 40 ऐसे मिले, जिनको पता हीं नहीं चला कि कोरोना वायरस कब हुआ और कब खत्म हो गया। यह 25 से 35 साल के उम्र के रहे। इन्होंने कोई दवा नहीं ली और कोरोना वायरस की जांच भी नहीं कराई थी। डॉक्टर की पूछताछ में पता चला तीन ने महज हल्की खांसी की बात कही, बाकी ने कोई लक्षण नहीं बताया
'वायरस लोड कम होने के कारण ऐसा संभव है'
वरिष्ठ पैथोलॉजिस्ट और आईएमए के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. अशोक शर्मा ने बताया कि संक्रमित होने के 24 से 48 घंटे में कोरोना वायरस की जांच कराने पर वायरस प्रभावी नहीं हो पाता, उसका लोड कम रहता है, ऐसे में रिपोर्ट निगेटिव या फॉल्स निगेटिव (पॉजिटिव होने पर भी निगेटिव) आने की संभावना रहती है। यही जांच अगर तीन से पांच दिन में कराई जाए तो वायरस की पहचान हो जाती है।
कैसे बनती हैं एंटीबॉडीज
एसएन मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अजित चाहर ने बताया कि एंटीबॉडीज हमारे शरीर के डिफेंस सिस्टम का हिस्सा हैं। जब हमारे शरीर में बैक्टीरिया या वायरस का संक्रमण हो जाता है तो उसे एंटीबॉडीज खत्म करती हैं। संक्रमण ठीक होने पर शरीर में एंटीबॉडी बनने लगती हैं। इसे ऐसे समझें कि यदि किसी के शरीर में कोरोना वायरस गया है तो उससे लड़ने के लिए एंटीबॉडीज बनती हैं। यदि वायरस नहीं है तो एंटीबॉडीज नहीं बनती हैं।