अगर मरना ही है तो परदेस में क्यों मरें...अपनों के बीच मरें.. कोरोना तो बाद में मारेगा... उससे पहले भूख जान ले लेगी... यह दर्द है उन मजदूरों का जो कभी ट्रक में बैठकर तो कभी पैदल चलकर अपने घर जा रहे हैं। कई मजदूर साइकिल से अपने घर जा रहे हैं। पूर्वांचल और बिहार के कई मजदूर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली से रविवार को आगरा पहुंचे थे। इनके पत्नी और बच्चे साथ में है। कह रहे हैं कोरोना पूरी तरह समाप्त हो जाए, तभी लौटेंगे घर से। घर में दो रोटी तो मिल ही जाएगी।
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नहीं मिली बस तो पैदल चल दिए
- फोटो : अमर उजाला
बिहार के कटिहार जिला निवासी नंदराम ने बताया कि वो पत्नी और बच्चों के साथ जोधपुर से आया है। वहां फैक्टरी में काम करता था। अप्रैल तक प्रशासन से भोजन के पैकेट मिलते रहे। मई में नहीं मिले। तब सोचा कि यहां रहने से भूख से मर जाएंगे। अगर मौत आनी ही है तो अपने गांव में आए, अपनों के बीच आए।
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वाहन के इंतजार में लोग
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महाराजगंज के चुन्नीलाल ने बताया कि पलवल में काम करते थे। मार्च से ही काम मिलना बंद हो गया था। अब तक जैसे जैसे दिन काटे। अब साथी चल दिए तो हम भी चल दिए। कोरोना खत्म हो जाए, हालात सामान्य हो जाएं, तभी घर से बाहर जाएंगे।
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पैदल जाते मजदूर
- फोटो : अमर उजाला
गोरखपुर के विकास का किस्सा भी ऐसा ही है। पत्नी और बच्चे के साथ आगरा पहुंचा। मथुरा से आगरा 70 किमी. पैदल चलकर आए हैं। विकास ने बताया कि गांव में गाय पाल लेंगे, चारा तो मिल ही जाता है, गाय से बच्चे को दूध मिल जाएगा। मेहनत मजदूरी पलवल में कर रहे थे, गांव के आसपास भी करेंगे। इतने बुरे दिन देखे हैं कि वापसी की सोचने की भी हिम्मत नहीं हो रही।
महाराजगंज के ही पप्पू ने बताया कि वह बयां नहीं कर सकता कि कितने खराब दिन थे। सुबह को रोटी मिली तो शाम को नहीं। किसी दिन तो सिर्फ पानी ही पीकर गुजारा किया। गांव में अपने लोग हैं, भूखे नहीं मरने देंगे।