उद्यमियों का कहना है कि एक तो विदेश से मांग कम है, इसलिए निर्यात पर बुरा असर पड़ा है। दूसरा, ताज और किला बंद हैं, तो सैलानी न के बराबर आ रहे हैं, इससे पेठा जैसे उद्योग नहीं चल पा रहे। कुशल कारीगर भी नहीं मिल रहे, क्योंकि वे लॉकडाउन के दौरान घर चले गए थे।
ताजनगरी में कोराना संक्रमण को आए छह महीने हो गए। इस दौरान लगभग ढाई महीना उद्योग-धंधे लॉकडाउन में बंद ही रहे। इसके बाद खोले जाने की इजाजत तो मिली, लेकिन संकट से उबर नहीं पाए।
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उद्यमियों का कहना है कि एक तो विदेश से मांग कम है, इसलिए निर्यात पर बुरा असर पड़ा है। दूसरा, ताज और किला बंद हैं, तो सैलानी न के बराबर आ रहे हैं, इससे पेठा जैसे उद्योग नहीं चल पा रहे। कुशल कारीगर भी नहीं मिल रहे, क्योंकि वे लॉकडाउन के दौरान घर चले गए थे।
1. जूता : 5000 में से 4500 इकाइयों में काम ठप
आगरा शू फैक्टर्स फेडरेशन के अध्यक्ष गागन दास रामानी ने बताया कि शहर में जूते के छोटे बड़े पांच हजार कारखाने हैं। लॉकडाउन से पहले सभी में काम हो रहा था। अब स्थिति यह है कि 4500 में काम ठप है, क्योंकि न लंबी दूरी की ट्रेनें चल रही हैं और न ही बसें। बाहर से खरीदार ही नहीं आ रहा और स्थानीय खपत इतनी ज्यादा नहीं है कि पूरा माल खप जाए। तीन लाख लोगों को जूता उद्योग से काम मिलता है। फिलहाल 25 हजार ही काम कर रहे हैं।
2. पेठा : 50 टन रोज था उत्पादन, दस ही रह गया
शहीद भगत सिंह कुटीर एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश अग्रवाल ने बताया कि पेठा उद्योग काफी हद तक पर्यटकों पर निर्भर है। पर्यटन ठप पड़ा है, इसलिए पेठा उद्योग चल नहीं पा रहा। 50 हजार मजदूर में से फिलहाल 1200 ही कार्यरत हैं। पहले 50 टन रोज उत्पादन होता था, अब 10 टन ही हो रहा है। करीब 50 करोड़ का नुकसान हो चुका है।
3. सराफा : चार लाख कारीगर, फिलहाल एक लाख ही काम पर
सराफा एसोसिएशन के महामंत्री अशोक अग्रवाल ने बताया कि लॉकडाउन के बाद कारोबार उबर ही नहीं पा रहा। सोना और चांदी का भाव चढ़ने से दिक्कत और बढ़ गई। ट्रेनें और लंबी दूरी की बसें न चलने से दक्षिण भारत के राज्यों में माल नहीं जा पा रहा। लॉकडाउन से पहले 5000 किलो जेवरात रोज बनाए जाते थे, अब यह 1.5 हजार किलो तक सीमित हैं। चार लाख लोग आभूषणों के कारखानों में काम करते हैं, फिलहाल एक लाख ही काम पर हैं।
4. फाउंड्री : 300 करोड़ का नुकसान
आगरा आयरन फाउंडर एसोसिएशन के अध्यक्ष अमर मित्तल ने बताया कि फाउंड्री और इससे जुड़ी शहर में 600 इकाइयां हैं। काम 50 फीसदी ही रह गया है। 700 करोड़ रुपये का होने वाला उत्पादन 250 करोड़ तक सीमित रह गया है। दो लाख श्रमिकों की संख्या भी घटकर आधी रह गई। करीब 300 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। लॉकडाउन में जो झटका लगा, उससे उद्योग उबर ही नहीं पा रहा है। बाजार में मांग ही घट गई है।
ताजमहल
- फोटो : अमर उजाला
पर्यटन: 20 हजार को जगह केवल 277 सैलानी
168 दिन से बंद चल रहे स्मारक एक सितंबर को आगरा में खोले गए। संस्कृति मंत्रालय के आदेश के तहत तो पूरे देश में जुलाई में ही स्मारक खोल दिए गए थे, लेकिन आगरा में कंटेनमेंट जोन के कारण ताजमहल और किला समेत सभी स्मारक बंद रहे थे।
हालांकि किला और ताजमहल को छोड़कर बाकी स्मारकों को एक सितंबर से खोल दिया गया है। बीते साल इन दिनों में ताज में 20 हजार, किला में 12 हजार, फतेहपुर सीकरी में हर दिन 4 से 5 हजार सैलानी और सिकंदरा में 2500 से 3500 सैलानी प्रतिदिन पहुंचते थे।
महताब बाग में 700 से 800 पर्यटक आते थे। 168 दिन बाद खुले 6 स्मारकों में केवल 270 पर्यटक ही पहुंच पाए, जिनमें सबसे ज्यादा 142 पर्यटकों ने महताब बाग और सिकंदरा में 77 पर्यटकों ने दीदार किया। बाकी सभी स्मारकों में पर्यटकों की संख्या 16 से 18 के बीच बनी रही।
180 की जगह सिर्फ 16 ट्रेनें चल रहीं
आगरा रेल मंडल से 16 स्पेशल यात्री ट्रेनों का संचालन पिछले तीन माह से किया जा रहा है। कोरोना संक्रमण से पहले प्रतिदिन 180 यात्री ट्रेनों का संचालन किया जाता था। स्टेशन की व्यवस्था भी बदल गई है। अब यात्री को एक घंटे पहले पहुंचना होता है।
स्टेशन पर संपर्क रहित टिकट जांच से लेकर तापमान की जांच तक करानी होती है। वहीं रोडवेज में जहां कोरोना काल से पहले 675 बसें चलती थीं अब 435 ही चलाई जा रही हैं वे भी सिर्फ राज्य की सीमा के अंदर।